भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन का कलर नीला क्यों है? जानिए बिना बिजली और डीजल के कैसे चलती है ये ट्रेन
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को नीला रंग ही क्यों दिया गया है? इसके पीछे सिर्फ खूबसूरत डिजाइन नहीं, बल्कि हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी से जुड़ी एक खास वजह भी है। जानिए नीले रंग वाली इस ट्रेन की पूरी कहानी।

In Short
- भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा के जींद से सोनीपत के बीच 89 किलोमीटर के रूट पर चलती है और 12 स्टेशनों पर रुकती है।
- ट्रेन हाइड्रोजन फ्यूल सेल से बनी बिजली पर चलती है। इससे धुआं नहीं निकलता और सिर्फ पानी की भाप बाहर आती है।
- करीब 112 करोड़ रुपये के इस पायलट प्रोजेक्ट में मल्टी-लेयर सेफ्टी सिस्टम लगाया गया है। रेलवे का देशभर में 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने का प्लान है।
India hydrogen train: भारत में रेल सफर ने नई टेक्नोलॉजी की ओर बड़ा कदम बढ़ा लिया है। देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन यात्रियों को कम किराये में सफर कराने के साथ हवा को साफ रखने में भी मदद करेगी। इसका नीला रंग, चलने का तरीका और सेफ्टी सिस्टम आम ट्रेनों से बिल्कुल अलग है।
अब जानते हैं ट्रेन के नीले रंग, किराये, रूट, स्पीड, सेफ्टी सिस्टम और पूरे प्रोजेक्ट की खास बातें।
नीले रंग के पीछे क्या है वजह?
नीला रंग पानी, आसमान और सफाई से जुड़ा माना जाता है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन मिलने पर पानी बनता है। जर्मनी की Coradia iLint और जापान की Hybari हाइड्रोजन ट्रेन भी नीले रंग की हैं।

कनाडा, चीन और अमेरिका में चलने वाली ज्यादातर हाइड्रोजन ट्रेनों में भी नीला रंग रखा गया है। भारत की ट्रेन को भी दुनिया की दूसरी हाइड्रोजन ट्रेनों की तरह नीला रंग दिया गया है। अब सवाल है कि यह ट्रेन किस रूट पर और कितनी दूरी तक चलती है?
89 किलोमीटर के सफर में इन स्टेशनों पर रुकेगी ट्रेन
भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन हरियाणा के जींद से सोनीपत के बीच चलती है। इसका पूरा रूट 89 किलोमीटर लंबा है। ट्रेन में 8 पैसेंजर कोच और 2 पावर कार हैं। इसमें 682 सीटें हैं और कुल 2,600 यात्री सफर कर सकते हैं। इसका किराया प्लेटफॉर्म टिकट और दिल्ली मेट्रो से भी कम रखा गया है।
यह ट्रेन जींद सिटी, गोहाना, पांडु पिंडारा, ललित खेड़ा, भांभेवा, इसापुर खेड़ी, बुटाना, खांडराई, राबरा, लाथ, मोहाना और सोनीपत स्टेशन पर रुकती है। इसकी चलने की सामान्य स्पीड 75 किलोमीटर प्रति घंटा है, जबकि ट्रायल के दौरान यह 120 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड तक पहुंची थी।
अब सवाल है कि बिना डीजल और बाहर से मिलने वाली बिजली के यह ट्रेन आखिर चलती कैसे है?
बिना डीजल और बिजली के कैसे चलेगी?
आम ट्रेनें डीजल या बिजली से चलती हैं, लेकिन इस ट्रेन के खास टैंकों में हाइड्रोजन गैस भरी जाती है। फ्यूल सेल में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिलने से बिजली बनती है और उसी बिजली से ट्रेन चलती है। इस दौरान धुआं नहीं निकलता, सिर्फ पानी की भाप बाहर आती है। इसी वजह से इसे ग्रीन या क्लीन टेक्नोलॉजी कहा जाता है।
अब सवाल है कि हाइड्रोजन गैस के इस्तेमाल के दौरान यात्रियों की सेफ्टी के लिए ट्रेन में क्या इंतजाम किए गए हैं?
सेफ्टी के लिए मल्टी-लेयर सिस्टम
हाइड्रोजन गैस के इस्तेमाल को देखते हुए ट्रेन की सेफ्टी पर खास ध्यान दिया गया है। इसमें हाइड्रोजन गैस लीक होने का पता लगाने के लिए लीक डिटेक्टर, आग का पता लगाने के लिए फायर डिटेक्टर और हर समय नजर रखने के लिए मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए गए हैं।
ट्रेन और उससे जुड़े पूरे सेटअप वाले इस पायलट प्रोजेक्ट पर करीब 112 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।अब सवाल है कि ट्रेन में हाइड्रोजन गैस भरने और उसे संभालकर रखने के लिए जींद में क्या इंतजाम किए गए हैं?
जींद में बनाया गया रिफ्यूलिंग प्लांट
जींद में हाइड्रोजन गैस को जमा रखने, दबाव बढ़ाने और ट्रेन में भरने के लिए रिफ्यूलिंग प्लांट बनाया गया है। यहां गैस लीक होने का पता लगाने के लिए लीक डिटेक्टर, आग की लपट पहचानने के लिए फ्लेम डिटेक्टर, जरूरत पड़ने पर सिस्टम को अपने आप बंद करने के लिए ऑटो शटडाउन, पानी का स्प्रे और फायर अलार्म लगाए गए हैं।
रेलवे का प्लान ‘हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज’ के तहत देश में कुल 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने का है।

