PM Modi Indonesia Visit: प्रांबानन मंदिर क्यों है खास? जानिए 1000 साल पुराने इस हिंदू मंदिर का इतिहास और महत्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडोनेशिया के ऐतिहासिक प्रांबानन मंदिर का दौरा किया और इसके जीर्णोद्धार परियोजना की शुरुआत की। जानिए 1,000 साल पुराने इस यूनेस्को विश्व धरोहर हिंदू मंदिर का इतिहास, भारत की भूमिका और क्यों यह यात्रा दोनों देशों के रिश्तों के लिए बेहद अहम मानी जा रही है।

In Short
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने प्रांबानन मंदिर के जीर्णोद्धार परियोजना की औपचारिक शुरुआत की।
- करीब 1,000 साल पुराने यूनेस्को विश्व धरोहर प्रांबानन मंदिर के संरक्षण का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इंडोनेशिया के साथ मिलकर करेगा।
- प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति, सांस्कृतिक कूटनीति और भारत-इंडोनेशिया संबंधों को नई मजबूती देने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
PM Modi Indonesia Visit: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा का एक अहम पड़ाव प्रांबानन मंदिर परिसर रहा। इस दौरान इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो भी उनके साथ मौजूद थे।
दुनिया के सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले देश के राष्ट्रपति का इस मंदिर यात्रा में शामिल होना भारत और इंडोनेशिया के गहरे सांस्कृतिक और रणनीतिक रिश्तों की अहम मिसाल माना जा रहा है।
2025 में हुई थी इस पहल की शुरुआत
प्रांबानन मंदिर के जीर्णोद्धार में भारत के सहयोग की नींव 2025 में राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के भारत दौरे के दौरान रखी गई थी। दोनों देशों के संयुक्त बयान में भारत ने मंदिर के संरक्षण और जीर्णोद्धार में मदद का वादा किया था।
ASI करेगा मंदिर के जीर्णोद्धार में सहयोग
करीब एक हजार साल पुराने इस मंदिर के संरक्षण का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) करेगा। इस परियोजना में ASI, इंडोनेशिया के संस्कृति मंत्रालय और इंडोनेशियन हेरिटेज इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर काम करेगा। ASI दुनिया की चुनिंदा संस्थाओं में शामिल है, जिसे प्राचीन मंदिरों के संरक्षण और पुनर्निर्माण का लंबा अनुभव है।
मूल पत्थरों से फिर खड़ा होगा मंदिर
मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए ASI 'एनास्टाइलोसिस' तकनीक का इस्तेमाल करेगी। इस तकनीक में किसी प्राचीन इमारत को उसके मूल पत्थरों से ही दोबारा खड़ा किया जाता है, ताकि उसकी ऐतिहासिक पहचान और मूल स्वरूप बरकरार रहे।
भारत-इंडोनेशिया रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती
यह परियोजना केवल एक मंदिर के संरक्षण तक सीमित नहीं है। इसे भारत और इंडोनेशिया के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक रिश्तों को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।
इस परियोजना की शुरुआत 2026-27 में हो रही है। इसी दौरान गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की 1927 में जावा और प्रांबानन यात्रा के 100 वर्ष भी पूरे होंगे।
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति और 'महासागर विज़न' का भी अहम हिस्सा मानी जा रही है।
कहां है प्रांबानन मंदिर?
प्रांबानन मंदिर इंडोनेशिया के मध्य जावा में जोगजकार्ता शहर के पास स्थित है। यह शहर से करीब 17 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में है। इस मंदिर संकुल का निर्माण लगभग 850 ईस्वी में संजय वंश के राजा राकाई पिकातन ने करवाया था।
प्रांबानन इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। यह त्रिमूर्ति यानी भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। एक समय इस मंदिर परिसर में करीब 240 मंदिर थे। वहीं पूरे प्रांबानन क्षेत्र में सेवु, बुब्रह और लुम्बुंग सहित 500 से अधिक मंदिर मौजूद हैं।
47 मीटर ऊंचा है मुख्य शिव मंदिर
प्रांबानन परिसर का मुख्य शिव मंदिर करीब 47 मीटर ऊंचा है। इसे इंडोनेशिया के सबसे ऊंचे प्राचीन धार्मिक स्मारकों में गिना जाता है।
यहां भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा के साथ-साथ उनके वाहनों के भी मंदिर बनाए गए हैं। प्रांबानन मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारत की पल्लव और चोल शैली से प्रेरित मानी जाती है। इसमें ऊंचे विमान, विशाल प्रांगण और वास्तु शास्त्र की मंडल अवधारणा साफ दिखाई देती है।
इस मंदिर की सबसे खास बात इसकी दीवारों पर बनी रामायण की शिल्पकला है। यहां भगवान राम के वनवास से लेकर रावण वध तक पूरी रामायण कथा पत्थरों पर उकेरी गई है।
UNESCO की विश्व धरोहर लिस्ट में शामिल
साल 1991 में यूनेस्को ने प्रांबानन मंदिर को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया था। यह मंदिर कई सदियों तक उपेक्षित रहा। बाद में 19वीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश पुरातत्वविदों ने इसे दोबारा खोजा। इससे पहले यह लंबे समय तक वीरान पड़ा रहा था।
प्रांबानन मंदिर से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा भी है। मान्यता है कि राजकुमारी रोरो जोंगग्रांग को श्राप देकर पत्थर की दुर्गा महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति बना दिया गया था। कहा जाता है कि यह मूर्ति आज भी शिव मंदिर के भीतर मौजूद है।

