
40 की उम्र में भी JEE रैंक क्यों? जर्मनी से लौटे भारतीय प्रोफेशनल ने उठाया बड़ा सवाल
जर्मनी में करीब एक दशक बिताने के बाद बेंगलुरु लौटे मयुख ने JEE रैंक को लेकर अपना अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि विदेश में करियर के दौरान कॉलेज के नाम से ज्यादा काम और उपलब्धियों को महत्व मिला और सवाल उठाया कि भारत में JEE रैंक को इतने साल बाद भी इतना महत्व क्यों दिया जाता है।

In Short
- जर्मनी से लौटे मयुख ने बताया कि वहां लोग IIT और NIT जैसे भारतीय कॉलेजों को ज्यादा नहीं जानते थे।
- उन्होंने सवाल उठाया कि किशोर उम्र में दी गई JEE परीक्षा की रैंक को 40 की उम्र में भी इतना महत्व क्यों दिया जाता है।
- उनके मुताबिक, समय के साथ कॉलेज और JEE रैंक से ज्यादा रिसर्च, काम और प्रोफेशनल उपलब्धियां अहम हो सकती हैं।
भारत में JEE परीक्षा और इसमें मिलने वाली रैंक को काफी अहम माना जाता है। लेकिन क्या किशोर उम्र में दी गई इस परीक्षा की रैंक को कई साल बाद भी याद रखा जाना चाहिए? जर्मनी में करीब 10 साल रहने के बाद बेंगलुरु लौटे एक भारतीय प्रोफेशनल मयुख के अनुभव ने इस सवाल को सामने रखा है।
जर्मनी में IIT और NIT के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं
मयुख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जर्मनी में अपने अनुभव के बारे में बताया। उन्होंने भारत में मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करने के बाद जर्मनी जाने का फैसला किया था।
उन्होंने बताया कि जर्मनी में जिन लोगों से उनकी मुलाकात हुई, उन्हें भारत के कॉलेजों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। IIT, NIT और गोवा यूनिवर्सिटी जैसे नाम भी वहां बहुत ज्यादा मायने नहीं रखते थे।
मयुख के मुताबिक, जब वह 2016 में जर्मनी गए थे, तब वहां भारतीयों की संख्या भी ज्यादा नहीं थी।
करियर में कॉलेज से ज्यादा काम पर ध्यान
मयुख ने इंजीनियरिंग छोड़कर प्योर साइंस के क्षेत्र में काम शुरू किया। इस दौरान उन्होंने अलग-अलग यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स के साथ काम किया। ऐसे में उनके अंडरग्रेजुएट कॉलेज का नाम उनके करियर में ज्यादा मायने नहीं रखता था।
उन्होंने बताया कि जर्मनी में उनके करियर के दौरान उनके ग्रेजुएट स्कूल, रिसर्च, पब्लिकेशन, कॉन्फ्रेंस और इनवाइटेड टॉक्स को ज्यादा महत्व मिला।

बेंगलुरु लौटे तो फिर याद आया JEE
जब मयुख काम के लिए बेंगलुरु आए, तो यहां की बातचीत सुनकर उन्हें भारत का माहौल याद आया। लोगों के बीच उनसे यह पूछा गया कि JEE में उनकी रैंक क्या थी और उन्होंने किस कॉलेज से पढ़ाई की थी।
उन्होंने कहा कि वह लगभग भूल ही गए थे कि JEE को इतना बड़ा मुद्दा माना जाता है।
‘एक परीक्षा पर इतना ध्यान क्यों?’
मयुख ने कहा कि अच्छी JEE रैंक हासिल करना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, खासकर इतनी कम उम्र में। लेकिन उनका सवाल है कि किशोर उम्र में दी गई एक परीक्षा को इतने साल बाद भी इतना महत्व क्यों दिया जाता है।
उनके मुताबिक, करियर के शुरुआती दौर में JEE रैंक और कॉलेज का नाम अहम हो सकता है। लेकिन उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि 40 की उम्र में भी लोग किशोर उम्र में दी गई परीक्षा की रैंक के बारे में बात करते हैं।
भारत में सफलता को देखने का नजरिया
मयुख के अनुभव ने पढ़ाई और करियर को लेकर सोच पर सवाल खड़ा किया है। उनके मुताबिक, करियर की शुरुआत में JEE रैंक और कॉलेज का नाम अवसर दिलाने में मदद कर सकते हैं। लेकिन समय के साथ काम और करियर की उपलब्धियां ज्यादा अहम हो सकती हैं।
उन्होंने आखिर में सवाल उठाया कि क्या किशोर उम्र की पढ़ाई की उपलब्धियों को लेकर भारत में इतना जुड़ाव कहीं “छूटे हुए बचपन के अफसोस” से जुड़ा हो सकता है।

