scorecardresearch

यूरेनियम नहीं, अब थोरियम से चलेगा भारत! न्यूक्लियर गेम में बड़ा दांव - Thorium मिशन की धमाकेदार शुरुआत

भारत ने थोरियम आधारित न्यूक्लियर ऊर्जा की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। कलपक्कम में PFBR की पहली क्रिटिकलिटी से तीन-चरणीय योजना को गति मिली है। यह रिएक्टर ज्यादा ईंधन पैदा कर सकता है और लाखों घरों को बिजली देगा, जिससे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की उम्मीद मजबूत हुई है।

Advertisement

भारत ने अपनी न्यूक्लियर ऊर्जा रणनीति में एक अहम कदम बढ़ाया है। देश के पास दुनिया के कुल थोरियम भंडार का करीब 25% हिस्सा है, और अब इसी संसाधन पर भविष्य की ऊर्जा निर्भरता बनाने की तैयारी तेज हो गई है। तमिलनाडु के कलपक्कम न्यूक्लियर कॉम्प्लेक्स में शुरू हुआ नया रिएक्टर इस दिशा में पहला बड़ा संकेत है।

advertisement

PFBR ने हासिल की ‘पहली क्रिटिकलिटी’

भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड द्वारा बनाए गए 500 मेगावॉट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने 6 अप्रैल को 'फर्स्ट क्रिटिकलिटी' हासिल की। इसका मतलब है कि रिएक्टर में नियंत्रित न्यूक्लियर फिशन चेन रिएक्शन सफलतापूर्वक शुरू हो गया है।

यह रिएक्टर खास इसलिए है क्योंकि यह जितना ईंधन जलाता है, उससे ज्यादा पैदा करता है। 500 MWe की क्षमता वाला यह प्लांट एक साथ 4-5 लाख भारतीय घरों को बिजली दे सकता है। फिलहाल इसे लो-पावर परीक्षणों से गुजारा जाएगा, इसके बाद इसे ग्रिड से जोड़ा जाएगा।

तीन चरणों वाली रणनीति में दूसरा पड़ाव

भारत का न्यूक्लियर प्रोग्राम तीन चरणों में काम करता है। पहले चरण में प्राकृतिक यूरेनियम से प्लूटोनियम तैयार किया जाता है। दूसरे चरण, जहां देश अभी पहुंचा है, में इसी प्लूटोनियम का इस्तेमाल फास्ट ब्रीडर रिएक्टर में होता है, जो नया ईंधन तैयार करते हैं।

यहीं से थोरियम की भूमिका शुरू होती है। ये रिएक्टर थोरियम से यूरेनियम-233 तैयार करेंगे, जो तीसरे चरण का आधार बनेगा।

क्या है थोरियम और क्यों है खास?

1828 में स्वीडिश केमिस्ट जोंस जैकब बर्ज़ेलियस (Jons Jakob Berzelius) ने थोरियम की खोज की थी। यह धातु प्रकृति में यूरेनियम से ज्यादा मात्रा में पाई जाती है।

हालांकि थोरियम खुद फिशाइल नहीं है, लेकिन न्यूट्रॉन अवशोषित करने पर यह यूरेनियम-233 में बदल जाता है जो बेहतरीन न्यूक्लियर ईंधन है। भारत के पास यूरेनियम के सीमित भंडार (करीब 1-2%) हैं और ज्यादातर आयात करना पड़ता है। इसके मुकाबले थोरियम प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, इसलिए इस पर फोकस बढ़ना तय माना जा रहा है।

हालांकि थोरियम आधारित ऊर्जा का व्यापक इस्तेमाल अभी दूर है। अनुमान है कि इसे बड़े स्तर पर लागू होने में 15-20 साल लग सकते हैं। लेकिन कलपक्कम में PFBR की सफलता ने इस दिशा में ठोस शुरुआत कर दी है।