Gen Z ने बदली ऑफिस की सोच! अब कर्मचारी छिपाने के बजाय खुलकर बता रहे मानसिक स्वास्थ्य की परेशानियां
Gen Z कर्मचारी अब ऑफिस में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों को छिपाने के बजाय खुलकर बात कर रहे हैं। तनाव, एंग्जायटी और बर्नआउट जैसी समस्याओं को लेकर उनकी सोच ने कंपनियों को भी अपना वर्क कल्चर बदलने पर मजबूर किया है। अब सवाल सिर्फ सुविधा का नहीं बल्कि भरोसे का है।

In Short
- Gen Z कर्मचारी अब मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी नहीं बल्कि ऑफिस बातचीत का जरूरी हिस्सा मान रहे हैं।
- 20 से 25 साल के कर्मचारियों में काउंसलिंग इस्तेमाल दो साल में 203% बढ़ा है।
- कंपनियों को सिर्फ वेलनेस प्रोग्राम नहीं बल्कि भरोसे और सपोर्ट वाला माहौल बनाना होगा।
कभी ऑफिस में अपनी परेशानी बताना आसान नहीं होता था। लोग अक्सर मानसिक तनाव या दूसरी निजी दिक्कतों को छिपाकर काम करते थे और छुट्टी लेने के लिए सिर्फ “पर्सनल रीजन” लिख देते थे। लेकिन अब नई पीढ़ी यानी Gen Z इस सोच को बदल रही है। वह अपनी परेशानियों को खुलकर बताने और मदद मांगने में पहले से ज्यादा सहज दिख रही है।
यह बदलाव सिर्फ छुट्टी लेने के तरीके तक सीमित नहीं है, बल्कि ऑफिस में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सोच बदलने की बड़ी तस्वीर दिखाता है।
Gen Z ने ऑफिस में तोड़ी चुप्पी
कुछ समय पहले एक Gen Z कर्मचारी का छुट्टी वाला ईमेल सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। कर्मचारी ने छुट्टी लेने की वजह “तेज पीरियड दर्द, क्रैंप और परेशानी” बताई थी। पहले ऐसी बातों को लोग “पर्सनल रीजन” या “हेल्थ इश्यू” कहकर टाल देते थे।
इस ईमेल को Knot Dating के को-फाउंडर और CEO जसवीर सिंह ने शेयर किया और कहा कि Gen Z ने ऑफिस में कई बेवजह की झिझक को खत्म किया है। अब यही बदलाव मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी दिखाई दे रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी जागरूकता
Gen Z के कर्मचारी एंग्जायटी, खराब नींद, अकेलापन और बर्नआउट जैसी परेशानियों को खुलकर स्वीकार कर रहे हैं। वह सिर्फ काम पूरा करने पर नहीं, बल्कि काम के साथ मानसिक रूप से स्वस्थ रहने पर भी ध्यान दे रहे हैं।
YourDOST की 2015 से 2025 तक की 5 लाख से ज्यादा काउंसलिंग सेशन की रिपोर्ट बताती है कि लोगों के मदद लेने के तरीके बदले हैं। महामारी से पहले काम के समय होने वाले सेशन 54.7% थे, जो बाद में बढ़कर 56.4% हो गए। वहीं वीकडे सेशन 55.86% से बढ़कर 57.61% हो गए।
युवाओं में काउंसलिंग का इस्तेमाल बढ़ा
ConsciousLeap के फाउंडर और CEO संजय देसाई के मुताबिक भारत की कंपनियों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सुविधाओं का इस्तेमाल 2023 से 44% बढ़ा है। वहीं 20 से 25 साल के कर्मचारियों में काउंसलिंग का इस्तेमाल दो साल में 203% बढ़ा है।
उनका कहना है कि Gen Z मानसिक स्वास्थ्य को काम का हिस्सा मान रही है। वह चाहती है कि कंपनी में उसे मदद मिले, उसकी प्राइवेसी बनी रहे और परेशानी बताने पर उसे कमजोर न समझा जाए।
सिर्फ सुविधा नहीं अब कंपनी कल्चर भी जरूरी
पहले कंपनियां Employee Assistance Programme, काउंसलिंग और वेलनेस कैंपेन जैसी सुविधाएं देती थीं। लेकिन अब युवा कर्मचारी यह भी पूछ रहे हैं कि कंपनी ऐसा माहौल बना रही है या नहीं जहां वह खुलकर बात कर सकें।
इसमें काम का दबाव, मैनेजर का व्यवहार, भरोसा, लचीलापन और ऑफिस का माहौल भी शामिल है। कर्मचारियों के लिए जरूरी हो गया है कि वे ऐसी जगह काम करें जहां वह अपनी बात रखने में डर महसूस न करें।
मदद मांगने के बाद भी बनी हुई है चुनौती
हालांकि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलापन बढ़ा है, लेकिन हर कर्मचारी मदद लेने के लिए आगे नहीं आता। संजय देसाई के मुताबिक करीब 26.6% कर्मचारी काउंसलिंग बुक करने के बाद भी सेशन में शामिल नहीं होते।
वहीं अब हर तीन में से एक कर्मचारी जो थेरेपी शुरू करता है, वह कई सेशन तक वापस आता है। इससे पता चलता है कि झिझक कम हुई है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
YourDOST के एक प्रोग्राम में नियमित जानकारी, बातचीत और सपोर्ट से ब्लू कॉलर और व्हाइट कॉलर कर्मचारियों के बीच काउंसलिंग इस्तेमाल में 30% की बढ़ोतरी देखी गई।
कंपनियों को बदलनी होगी सोच
YourDOST के आंकड़ों के अनुसार 2019 से 2024 के बीच ज्यादा तनाव वाले लोगों की संख्या करीब 40% बढ़ी है। यह आंकड़ा 43.79% से बढ़कर 61.44% हो गया। वहीं ज्यादा एंग्जायटी 2020 में 20.40% से बढ़कर 2025 में 40.40% हो गई।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि कंपनियों को सिर्फ काउंसलिंग सुविधा देने से आगे बढ़ना होगा। उन्हें ऐसा माहौल बनाना होगा जहां कर्मचारी बिना डर अपनी परेशानी बता सकें।
Ericsson Southeast Asia, Oceania और India की HR हेड प्रियंका आनंद के मुताबिक कई बार कर्मचारियों को पता होता है कि मदद उपलब्ध है, लेकिन उन्हें यह भरोसा नहीं होता कि मैनेजर कैसे प्रतिक्रिया देगा।
मैनेजर की भूमिका सबसे अहम
एक्सपर्ट्स के अनुसार मैनेजर को थेरेपिस्ट बनने की जरूरत नहीं है, लेकिन उन्हें अच्छा श्रोता जरूर बनना होगा। जब कर्मचारी यह कह सके कि “मैं परेशानी में हूं” और उसे डर न हो कि इससे उसकी क्षमता पर सवाल उठेगा, तभी ऑफिस कल्चर बदलेगा।
Gen Z ने शुरुआत में यह बदलाव किया कि कर्मचारी अब छुट्टी लेने की असली वजह बताने लगे हैं। लेकिन बड़ा बदलाव यह है कि अब लोग यह कहने की हिम्मत जुटा रहे हैं कि काम उनके लिए मुश्किल हो रहा है और उन्हें मदद की जरूरत है।

