एआई को चलाने के लिए क्यों लगता है पानी?
जब भी आप एआई को कोई छोटा सा भी काम करने के लिए कहते हैं, तो उसे पूरा करने के लिए हजारों प्रोसेसर एक साथ काम करते हैं। इससे भारी मात्रा में थर्मल एनर्जी और गर्मी पैदा होती है। इस पैदा होने वाली ऊर्जा और गर्मी से लाखों-करोड़ों डॉलर की महंगी मशीनें जल सकती हैं या उनके प्रोसेसर पिघल सकते हैं।
इसे रोकने के लिए डेटा सेंटर्स कूलिंग टावर्स का इस्तेमाल करते हैं। ये एक खास तरह का कूलिंग सिस्टम है, जो पानी को गर्म सतह पर फैलाता है, जिससे मशीनों से निकलने वाली गर्मी भाप बनकर उड़ जाती है। इस प्रक्रिया में करीब 80 प्रतिशत पानी भाप बनकर हवा में गायब हो जाता है। जो पानी भाप बन जाता है, उसे दोबारा रीसायकल नहीं किया जा सकता। इसी वजह से डेटा सेंटर्स में पानी की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।
डेटा सेंटर को सिर्फ साफ पानी ही क्यों चाहिए?
जब डेटा सेंटर्स को इतना ज्यादा पानी चाहिए, तो वे रीसायकल या ग्रे वॉटर का इस्तेमाल क्यों नहीं करते? यह सवाल आपके मन में भी आ सकता है लेकिन डेटा सेंटर्स आमतौर पर रीसायकल किया हुआ पानी इस्तेमाल नहीं कर सकते।
ऐसा इसलिए क्योंकि पानी में कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे कई मिनरल्स होते हैं। हर बार जब पानी रीसायकल होता है, तो इन मिनरल्स की मात्रा बढ़ जाती है। समय के साथ ये मिनरल्स मिलकर एक मोटी परत बना लेते हैं, जिसे लाइमस्केल (Limescale) कहा जाता है।
यह लाइमस्केल एक मोटी चादर की तरह काम करता है। अगर ऐसा रीसायकल्ड पानी डेटा सेंटर में इस्तेमाल किया जाए, तो इस परत की वजह से मशीनों में बनी गर्मी बाहर नहीं निकल पाएगी और मशीनें खराब हो सकती हैं।
रीसायकल पानी का इस्तेमाल करने के लिए कंपनियों को अपना अलग वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना पड़ता है, जो काफी महंगा होता है। ऐसे में डेटा सेंटर्स अक्सर पीने योग्य साफ पानी का इस्तेमाल करके अपने सिस्टम को चालू रखते हैं।
एआई का पर्यावरण पर असर
डेटा सेंटर्स की इस बढ़ती हुई पानी की मांग को लेकर वैज्ञानिक काफी चिंतित हैं। मॉर्गन स्टेनली की एक रिपोर्ट के अनुसार, एआई डेटा सेंटर्स में पानी की खपत 2028 तक 11 गुना तक बढ़ सकती है। ज्यादातर डेटा सेंटर्स ऐसे इलाकों में स्थित हैं, जहां पहले से ही पानी की कमी है।
भारत में बढ़ती पानी की कमी
आज देश में चल रहे एआई इम्पैक्ट समिट में भारत में नए डेटा सेंटर्स खोलने की बातें हो रही हैं। वहीं इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि भारत में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी रहती है, लेकिन दुनिया का केवल 4 प्रतिशत साफ पानी ही भारत के पास है।
ऐसे में बनने वाले नए डेटा सेंटर्स भारत के पहले से ही घटते हुए साफ पानी के संसाधनों पर और ज्यादा दबाव डाल सकते हैं। आज बन रहे कई नए डेटा सेंटर्स मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में हैं, जो पहले से ही पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं।