भारत के न्यूक्लियर सेक्टर में बढ़ी हलचल, बड़ी कंपनियां क्यों तलाश रहीं नए विकल्प?
भारत की बड़ी कंपनियां छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर की संभावनाएं तलाश रही हैं। रिलायंस, अदाणी, टाटा पावर, JSW और जिंदल न्यूक्लियर पावर ने ग्लोबल सप्लायर्स के साथ बातचीत शुरू की है। कंपनियों की नजर कम क्षमता वाले रिएक्टर पर है, लेकिन लागत, टेक्नोलॉजी और उपकरणों की उपलब्धता बड़ी चुनौती बनी हुई है।

In Short
- रिलायंस अदाणी टाटा पावर समेत बड़ी कंपनियों की छोटे न्यूक्लियर रिएक्टर में दिलचस्पी
- NPCIL 220 मेगावाट PHWR को BSR में बदलने के लिए डिजाइन पर कर रही काम
- भारत ने 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर पावर क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है
भारत में न्यूक्लियर पावर को लेकर बड़ी कंपनियों की दिलचस्पी बढ़ रही है। रिलायंस, अदाणी, टाटा पावर, JSW और जिंदल न्यूक्लियर पावर प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियों ने अमेरिका, फ्रांस, कोरिया, रूस और जापान के ग्लोबल सप्लायर्स के साथ बातचीत शुरू की है। कंपनियों का फोकस SMR टेक्नोलॉजी पर है, जो अभी दुनिया भर में डेवलपमेंट के दौर में है।
पुराने PHWR के सामने क्या चुनौती?
भारत में घरेलू स्तर पर तैयार 220 मेगावाट के प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर यानी PHWR की नई यूनिट 2011 के बाद से नहीं लगाई गई है। इसके लिए जरूरी न्यूक्लियर टर्बाइन बनाने वाली प्रमुख कंपनियों ने भी इनका प्रोडक्शन बंद कर दिया है।
न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी NPCIL अब 220 मेगावाट PHWR डिजाइन में बदलाव करके इसे भारत स्मॉल रिएक्टर यानी BSR के रूप में तैयार करने पर काम कर रही है।
इसके डिजाइन में स्टील लाइनर जोड़ने के साथ कंट्रोल और इंस्ट्रूमेंटेशन सिस्टम को अपग्रेड करने की तैयारी है, ताकि सुरक्षा को बेहतर किया जा सके।
उपकरण जुटाना भी बड़ी परेशानी
पुराने 220 मेगावाट PHWR लगाने की इच्छा रखने वाली कंपनियों के सामने उपकरण जुटाने की भी चुनौती है। L&T और BHEL जैसे बड़े घरेलू सप्लायर्स ने 220 मेगावाट टर्बाइन बनाना बंद कर दिया है।
अगर इनका प्रोडक्शन दोबारा शुरू करना है तो कंपनियों को पर्याप्त ऑर्डर की जरूरत होगी, ताकि इस टेक्नोलॉजी के लिए फिर से मैन्युफैक्चरिंग क्षमता उपलब्ध कराई जा सके।
छोटे रिएक्टर क्यों चाहती हैं कंपनियां?
भारतीय कंपनियां शुरुआत में 300 मेगावाट से कम क्षमता वाले छोटे रिएक्टर लगाने में दिलचस्पी दिखा रही हैं। इसके बाद वे 700 मेगावाट से ज्यादा क्षमता वाली यूनिट की तरफ बढ़ना चाहती हैं।
इसकी बड़ी वजह शुरुआती लागत है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक विदेशी रिएक्टर की औसत लागत करीब 35 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट है। ऐसे में 2,000 मेगावाट की क्षमता लगाने पर करीब 70,000 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं।
इसके मुकाबले 2X220 मेगावाट रिएक्टर की औसत लागत 20 से 25 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट के हिसाब से करीब 8,800 करोड़ से 11,000 करोड़ रुपये हो सकती है।
छोटे रिएक्टर से क्या फायदा?
कंपनियों की न्यूक्लियर पावर में दिलचस्पी के पीछे अपनी बिजली की जरूरत पूरी करने और जीरो-कार्बन लक्ष्य हासिल करने की जरूरत है। कंपनियां एक बड़े 1,000 मेगावाट रिएक्टर के बजाय चार छोटे रिएक्टर चलाना ज्यादा बेहतर मान रही हैं।
ऐसे में एक रिएक्टर मेंटेनेंस में जाने या बंद होने पर भी बाकी यूनिट से 70 से 75 फीसदी बिजली मिल सकती है। डेटा सेंटर, स्टील, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसे सेक्टर के लिए 220, 300 या 500 मेगावाट के छोटे रिएक्टर ज्यादा उपयोगी माने जा रहे हैं।
भारत ने 2047 तक 100 GW न्यूक्लियर क्षमता का लक्ष्य रखा है और इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसके लिए अलग-अलग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल जरूरी होगा।

