पानी से हाइड्रोजन बनाने की दिशा में बड़ी कामयाबी, IIT गुवाहाटी ने बनाया सस्ता निकेल कैटलिस्ट
IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने पानी से हाइड्रोजन बनाने के लिए कम लागत वाला निकेल आधारित कैटलिस्ट तैयार किया है। यह तकनीक कम ऊर्जा बर्बादी के साथ क्लीन हाइड्रोजन उत्पादन में मदद कर सकती है। रिसर्च में कैटलिस्ट की बेहतर स्थिरता और 88% तक ऊर्जा इस्तेमाल की क्षमता सामने आई है।

In Short
- IIT गुवाहाटी ने पानी से हाइड्रोजन बनाने के लिए सस्ता निकेल आधारित कैटलिस्ट विकसित किया।
- नए कैटलिस्ट में करीब 88% इलेक्ट्रिकल एनर्जी का इस्तेमाल पानी को तोड़ने में हुआ।
- निकेल और एंथ्रेसीन आधारित तकनीक लंबे समय तक स्थिर रहकर क्लीन हाइड्रोजन उत्पादन में मदद कर सकती है।
भारत में ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने की कोशिशों के बीच IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो पानी से हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया को आसान और कम खर्चीला बना सकती है। इस नई खोज में निकेल आधारित कैटलिस्ट का इस्तेमाल किया गया है, जो लंबे समय तक बेहतर तरीके से काम करने में सक्षम है। इस तकनीक से देश के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को भी मजबूती मिल सकती है और अब बात आती है कि आखिर यह नया कैटलिस्ट काम कैसे करता है।
पानी से हाइड्रोजन बनाने में मदद करेगा नया कैटलिस्ट
IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने निकेल और एंथ्रेसीन आधारित एक नया कैटलिस्ट तैयार किया है। यह पानी को तोड़कर हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया यानी इलेक्ट्रोलिसिस को ज्यादा प्रभावी बनाने में मदद करता है। अभी तक इस काम के लिए जिन कैटलिस्ट का इस्तेमाल किया जाता है, वे ज्यादातर महंगी और दुर्लभ धातुओं से बने होते हैं, जिससे बड़े स्तर पर इसका इस्तेमाल मुश्किल हो जाता है।
महंगी धातुओं का सस्ता विकल्प बना निकेल
शोधकर्ताओं ने हाइड्रोजन उत्पादन के लिए निकेल सॉल्ट का इस्तेमाल किया, क्योंकि यह कम कीमत में आसानी से उपलब्ध होता है। हालांकि अकेले निकेल सॉल्ट ज्यादा प्रभावी नहीं था और लंबे समय तक स्थिर भी नहीं रहता था। इसलिए टीम ने इसे एंथ्रेसीन आधारित ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल के साथ जोड़ा, जिससे इसकी क्षमता और स्थिरता दोनों बढ़ गई।
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कैटलिस्ट की खास संरचना से बढ़ी क्षमता
IIT गुवाहाटी के केमिस्ट्री विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और इस रिसर्च के प्रमुख शोधकर्ता अक्षय कुमार ने बताया कि टीम ने कोऑर्डिनेशन पॉलिमर आधारित कैटलिस्ट तैयार किया। इसमें एंथ्रेसीन यूनिट निकेल एटम से जुड़ी हुई हैं। इसे सामान्य तापमान पर अल्ट्रासोनिक वेव्स की मदद से तैयार किया गया।
इस संरचना की वजह से कैटलिस्ट में ज्यादा एक्टिव साइट्स बनती हैं, जिससे हाइड्रोजन बनाने वाली रिएक्शन तेजी से होती है। साथ ही इसमें इलेक्ट्रॉन ट्रांसपोर्ट भी बेहतर होता है।
88% बिजली का हुआ इस्तेमाल
शोध में सामने आया कि इस कैटलिस्ट की मदद से पानी को तोड़ने में करीब 88% इलेक्ट्रिकल एनर्जी का इस्तेमाल हुआ। वैज्ञानिकों के मुताबिक बड़े स्तर पर हाइड्रोजन उत्पादन के लिए ऊर्जा की बर्बादी कम होना बेहद जरूरी है।
शोधकर्ताओं ने केमिकल एनालिसिस और कंप्यूटर मॉडलिंग के जरिए भी इस कैटलिस्ट के प्रदर्शन को समझा। इसमें पाया गया कि निकेल और एंथ्रेसीन फ्रेमवर्क के बीच बेहतर तालमेल बना, जिससे इसकी कार्यक्षमता बढ़ी।
लंबे समय तक स्थिर रहने में सक्षम
इस कैटलिस्ट की एक बड़ी खासियत इसकी लॉन्ग टर्म स्टेबिलिटी है। टेस्टिंग के दौरान यह लंबे समय तक काम करता रहा और इसकी क्षमता में ज्यादा गिरावट नहीं देखी गई। रिसर्च में यह भी सामने आया कि निकेल एटम और एंथ्रेसीन मिलकर थ्री डायमेंशनल नेटवर्क बनाते हैं, जो इसे ज्यादा प्रभावी बनाता है।
क्लीन एनर्जी के लिए अहम कदम
दुनिया में अभी ज्यादातर हाइड्रोजन फॉसिल फ्यूल से बनाया जाता है। ग्रे और ब्लू हाइड्रोजन नेचुरल गैस से, जबकि ब्राउन और ब्लैक हाइड्रोजन कोयले से तैयार किया जाता है। इन प्रक्रियाओं में ग्रीनहाउस गैस निकलती हैं, जिससे पर्यावरण पर असर पड़ता है।
पानी से हाइड्रोजन बनाना ज्यादा साफ तरीका माना जाता है, क्योंकि इसके इस्तेमाल के बाद मुख्य रूप से पानी ही बायप्रोडक्ट के रूप में निकलता है। IIT गुवाहाटी की यह खोज सस्ती और टिकाऊ हाइड्रोजन तकनीक विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

