PM Internship Scheme में कंपनियों ने खोले हजारों मौके, फिर भी जॉइनिंग कम; सामने आई असली वजह
पीएम इंटर्नशिप स्कीम में कंपनियों की भागीदारी और इंटर्नशिप के मौके लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन असली चुनौती युवाओं को जॉइन कराने की है। लोकेशन, रहने-ट्रैवल का खर्च और पसंद के सेक्टर में रोल नहीं मिलना ऐसे कारण हैं, जो उपलब्ध मौकों और वास्तविक जॉइनिंग के बीच फासला बढ़ा रहे हैं।

In Short
- पीएम इंटर्नशिप स्कीम के तीसरे राउंड में 1.22 लाख मौके मिले, लेकिन 15 जुलाई तक सिर्फ 10,195 उम्मीदवारों ने जॉइन किया
- महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में ज्यादा मौके होने से बिहार-झारखंड के युवाओं के लिए लोकेशन बड़ी चुनौती बन रही है
- मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इंटर्नशिप ज्यादा हैं, जबकि कई युवाओं का झुकाव सर्विस सेक्टर के रोल की तरफ है
पीएम इंटर्नशिप स्कीम यानी पीएमआईएस में कंपनियां तेजी से मौके दे रही हैं और सरकार भी ज्यादा युवाओं तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में उम्मीदवार इंटर्नशिप के लिए आवेदन या चयन के बाद जॉइन नहीं कर रहे हैं। इसकी वजह सिर्फ मौके कम होना नहीं, बल्कि लोकेशन, सेक्टर और युवाओं की पसंद के बीच अंतर भी है। अब आंकड़ों से समझते हैं कि स्कीम के सामने यह चुनौती कितनी बड़ी है और सरकार इसे कम करने के लिए क्या कर रही है।
1.22 लाख मौके मिले, जॉइन करने वाले सिर्फ 10,195
सरकार के पास मौजूद लेटेस्ट डेटा के मुताबिक पीएमआईएस के तीसरे राउंड में 15 जुलाई तक करीब 1.22 लाख इंटर्नशिप के मौके दिए गए थे। ये मौके 31 सेक्टर की 340 कंपनियों ने दिए। हालांकि इसी तारीख तक सिर्फ 10,195 उम्मीदवारों ने फिजिकली इन इंटर्नशिप को जॉइन किया था। यानी कंपनियों की तरफ से मौके मौजूद हैं, लेकिन उम्मीदवारों को इन तक लाना और उन्हें जॉइन कराना बड़ी चुनौती बन रहा है।
करीब 98 हजार युवाओं को पीएमआईएस पोर्टल पर भेजा गया
सरकार ने युवाओं को स्कीम से जोड़ने के लिए मोबिलाइजेशन भी तेज किया है। संसद में दिए गए लिखित जवाब के मुताबिक 16 जुलाई तक माय भारत प्लेटफॉर्म से करीब 98,632 युवाओं को रजिस्ट्रेशन और एप्लिकेशन के लिए पीएमआईएस पोर्टल पर भेजा गया। इसके अलावा चेन्नई, पुणे और दंतेवाड़ा में आउटरीच कैंप भी लगाए गए, जहां उम्मीदवारों को कंपनियों से सीधे जोड़ने, उपलब्ध रोल समझाने और एप्लिकेशन पूरा करने में मदद दी गई।
लोकेशन बन रही बड़ी परेशानी
सरकारी सूत्रों के मुताबिक उम्मीदवारों के लिए इंटर्नशिप की लोकेशन एक अहम कारण है। बड़ी संख्या में मौके महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे इंडस्ट्रियल और इकोनॉमिक हब में हैं। बिहार और झारखंड जैसे राज्यों के युवाओं के लिए दूसरी जगह शिफ्ट होना मुश्किल हो सकता है, खासकर तब जब रहने और ट्रैवल का खर्च भी जोड़ना पड़े।
मैन्युफैक्चरिंग में मौके ज्यादा, सर्विस सेक्टर की तरफ युवाओं का झुकाव
स्कीम में सेक्टर को लेकर भी मिसमैच सामने आ रहा है। इंटर्नशिप के काफी मौके मैन्युफैक्चरिंग और उससे जुड़े सेक्टर में हैं, जबकि कई युवा सर्विस सेक्टर के रोल को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। इससे उपलब्ध मौके और उम्मीदवारों की पसंद के बीच अंतर बढ़ सकता है।
सरकार पहले भी मान चुकी है ये वजहें
सरकार ने पहले संसद में दिए जवाबों में लोकेशन, इंटर्नशिप की अवधि और कुछ रोल में दिलचस्पी नहीं होने को उम्मीदवारों के मौके स्वीकार नहीं करने की वजह बताया था। इसके बाद स्कीम में कंपनियों का दायरा और एलिजिबिलिटी बढ़ाई गई। अब फाइनल ईयर के ग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट छात्र भी इसमें शामिल हो सकते हैं।
हर महीने 9,000 रुपये की मदद
पीएमआईएस का मकसद लाखों युवाओं को कंपनियों में स्ट्रक्चर्ड और पेड इंडस्ट्री एक्सपीरियंस देना है। फिलहाल इंटर्न को हर महीने 9,000 रुपये की फाइनेंशियल असिस्टेंस दी जाती है। इसके साथ 6,000 रुपये का वन-टाइम इंसिडेंटल ग्रांट भी मिलता है। अब स्कीम की अगली बड़ी परीक्षा यही है कि बढ़ते मौकों को ज्यादा से ज्यादा युवाओं की वास्तविक जॉइनिंग में कैसे बदला जाए।

