लाइफ इंश्योरेंस के आंकड़ों ने चौंकाया! डेथ क्लेम पर सिर्फ 7% भुगतान, बाकी पैसा कहां गया? IRDAI की रिपोर्ट में खुलासा
लाइफ इंश्योरेंस खरीदते समय लोग अपने परिवार की आर्थिक सुरक्षा के बारे में सोचते हैं। लेकिन IRDAI के आंकड़े बीमा कंपनियों के भुगतान की एक चौंकाने वाली तस्वीर दिखाते हैं। कुल भुगतान में डेथ क्लेम की हिस्सेदारी सिर्फ 7% रही, जबकि पॉलिसी सरेंडर का हिस्सा कहीं ज्यादा था। आखिर ग्राहक अपनी पॉलिसी बीच में क्यों छोड़ रहे हैं? जानिए पूरी रिपोर्ट।

In Short
- लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों के ₹6.3 लाख करोड़ के कुल भुगतान में डेथ क्लेम की हिस्सेदारी सिर्फ 7% रही।
- पॉलिसी सरेंडर पर 37% रकम का भुगतान हुआ, जो डेथ क्लेम के मुकाबले पांच गुना से ज्यादा है।
- इंडस्ट्री का पांचवें साल के आसपास पर्सिस्टेंसी रेट 48% रहा, जबकि ऑनलाइन खरीदी गई पॉलिसियों में यह 71% था।
लोग लाइफ इंश्योरेंस इसलिए लेते हैं ताकि उनकी मौत के बाद परिवार को पैसों की परेशानी न हो। लेकिन बीमा कंपनियों के भुगतान से जुड़े आंकड़े चौंकाने वाले हैं। बीमा रेगुलेटर IRDAI की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियों ने जितना पैसा ग्राहकों को दिया, उसमें सिर्फ 7% रकम डेथ क्लेम की थी। वहीं पॉलिसी बीच में बंद करने वाले ग्राहकों को 37% रकम दी गई।
IRDAI की रिपोर्ट में क्या सामने आया?
IRDAI की रिपोर्ट के मुताबिक, लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों ने कुल ₹6.3 लाख करोड़ का भुगतान किया।
इसमें अलग-अलग तरह के भुगतान शामिल हैं।
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डेथ क्लेम: 7% रकम उन परिवारों को दी गई, जिनके बीमाधारक सदस्य की मौत हो गई।
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पॉलिसी सरेंडर: 37% रकम उन ग्राहकों को दी गई, जिन्होंने अपनी पॉलिसी समय से पहले बंद कर दी।
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मैच्योरिटी: 35% रकम उन ग्राहकों को मिली, जिनकी पॉलिसी का समय पूरा हो गया।
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पेंशन और एन्युटी: करीब 20% रकम पेंशन और नियमित भुगतान के रूप में दी गई।
यानी कंपनियों ने डेथ क्लेम के मुकाबले पॉलिसी बीच में बंद करने वालों को पांच गुना से ज्यादा पैसा दिया।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बीमा कंपनियां डेथ क्लेम देने से मना कर रही हैं। ये आंकड़े सिर्फ यह बताते हैं कि कुल भुगतान में किस तरह के क्लेम की कितनी हिस्सेदारी है।
पांच साल तक भी पॉलिसी नहीं चला पा रहे कई ग्राहक
रिपोर्ट में एक और बड़ी बात सामने आई है। लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों का पांचवें साल के आसपास पॉलिसी जारी रखने का रेट सिर्फ 48% है।
आसान भाषा में कहें तो 100 में से सिर्फ 48 ग्राहक ही पांच साल बाद भी अपनी पॉलिसी का प्रीमियम भर रहे होते हैं। बाकी 52 ग्राहक तब तक प्रीमियम भरना बंद कर चुके होते हैं।
कुछ कंपनियों में तो दसवें साल तक सिर्फ 8% पॉलिसियां ही चालू रह जाती हैं।
ऑनलाइन पॉलिसी खरीदने वाले ज्यादा समय तक जुड़े रहते हैं
रिपोर्ट के मुताबिक, ऑनलाइन खरीदी गई पॉलिसियों का रिकॉर्ड बेहतर है। ऑनलाइन पॉलिसी खरीदने वाले 100 में से करीब 71 ग्राहक पांच साल बाद भी प्रीमियम भर रहे होते हैं।
वहीं पूरी इंश्योरेंस इंडस्ट्री में यह आंकड़ा सिर्फ 48 है। इससे पता चलता है कि ऑनलाइन पॉलिसी खरीदने वाले ग्राहक अपनी पॉलिसी ज्यादा समय तक जारी रखते हैं। हालांकि, इसके पीछे की सही वजह इन आंकड़ों से साफ नहीं होती।
पॉलिसी बेचने पर एजेंट को कितना कमीशन मिलता है?
रिपोर्ट में बीमा पॉलिसी पर मिलने वाले कमीशन की भी जानकारी दी गई है। बचत से जुड़ी कुछ लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियों पर पहले साल एजेंट या बेचने वाली कंपनी को प्रीमियम का 25% से 37% तक कमीशन मिलता है।
कुछ बीमा कंपनियों में पहले साल पॉलिसी बेचने से जुड़ा कुल खर्च 60% से 80% तक पहुंच जाता है। लेकिन अगले सालों में इन्हीं पॉलिसियों पर कमीशन सिर्फ 0% से 5% तक रहता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पहले साल ज्यादा कमीशन मिलने की वजह से पॉलिसी बेचने पर ज्यादा जोर दिया जाता है?
पॉलिसी बीच में बंद करने पर कितना नुकसान?
अगर कोई ग्राहक कुछ साल तक प्रीमियम भरने के बाद अपनी पॉलिसी बंद कर देता है, तो जरूरी नहीं कि उसे जमा किया गया पूरा पैसा वापस मिले। मान लीजिए किसी ने पांच साल तक पॉलिसी का प्रीमियम भरा और फिर उसे बंद करने का फैसला किया।
ऐसी स्थिति में उसे जमा किए गए कुल पैसे से कम रकम वापस मिल सकती है। इसीलिए पॉलिसी बंद करने से पहले यह जानना जरूरी है कि कंपनी कितना पैसा वापस देगी। इस रकम को सरेंडर वैल्यू कहा जाता है।
अगर आपके पास भी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी है तो क्या करें?
अगर आपने ऐसी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदी है, जिसमें बीमा के साथ बचत भी होती है, तो उसके फायदे और खर्च को जरूर समझें। सबसे पहले देखें कि आपको आगे कितने साल प्रीमियम भरना है और पॉलिसी पूरी होने पर कितना पैसा मिलेगा।
इसके बाद आप टर्म इंश्योरेंस और इंडेक्स फंड जैसे विकल्पों से इसकी तुलना कर सकते हैं। टर्म इंश्योरेंस का मुख्य काम परिवार को आर्थिक सुरक्षा देना है। वहीं इंडेक्स फंड निवेश का एक तरीका है, जिसमें बाजार के उतार-चढ़ाव का जोखिम रहता है।
ध्यान रखें: सिर्फ इन आंकड़ों को देखकर अपनी मौजूदा पॉलिसी बंद न करें। पहले यह जरूर पता करें कि पॉलिसी बंद करने पर कितना पैसा वापस मिलेगा और उसे जारी रखने से क्या फायदा होगा।

