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आधे भारतीय बीमित फिर भी जेब पर भारी इलाज, हेल्थ सर्वे ने खोली हकीकत

भारत में हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज बढ़कर लगभग आधी आबादी तक पहुंच गया है, लेकिन इलाज पर जेब से खर्च अब भी ज्यादा है। सरकारी अस्पताल सस्ते हैं, जबकि निजी अस्पतालों में खर्च कई गुना अधिक है, जिससे लोगों पर आर्थिक बोझ बना हुआ है।

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AI Generated Image

भारत में हेल्थ इंश्योरेंस कवरेज में पिछले कुछ सालों में बड़ा सुधार हुआ है, लेकिन जेब से होने वाला खर्च अब भी चिंता का कारण बना हुआ है। Ministry of Statistics and Programme Implementation (MoSPI) के ताजा NSS सर्वे के मुताबिक, 2025 तक करीब आधे भारतीय किसी न किसी स्वास्थ्य बीमा के दायरे में आ चुके हैं। सर्वे के अनुसार, 2017-18 के मुकाबले बीमा कवरेज में तेज उछाल आया है, जिसमें सरकारी योजनाओं का सबसे बड़ा योगदान रहा।

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गांव-शहर दोनों में बढ़ा कवरेज

2025 में ग्रामीण भारत के 47% और शहरी क्षेत्रों के 44% लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है। यह आंकड़ा 2017 में 14% और 2018 में 19% था। यानी दोनों ही क्षेत्रों में कवरेज लगभग दोगुना से ज्यादा हुआ है।

बीमा बढ़ने के बावजूद इलाज का खर्च अब भी ऊंचा बना हुआ है। एक अस्पताल में भर्ती (बिना प्रसव) के लिए औसत जेब खर्च ₹34,064 रहा- ग्रामीण इलाकों में ₹31,484 और शहरी क्षेत्रों में ₹38,688। हालांकि मीडियन खर्च ₹11,285 रहा जो बताता है कि कई मामलों में खर्च कम है, लेकिन गंभीर मामलों में यह तेजी से बढ़ता है।

सरकारी अस्पताल सस्ते, निजी में खर्च ज्यादा

सरकारी अस्पतालों में इलाज निजी के मुकाबले सस्ता है। यहां औसत खर्च ₹6,631 रहा और आधे मामलों में यह ₹1,100 या उससे कम रहा। लेकिन जैसे ही निजी अस्पताल शामिल होते हैं, औसत खर्च कई गुना बढ़कर ₹34,064 तक पहुंच जाता है।

प्रसव के मामले में सरकारी अस्पतालों में औसत खर्च सिर्फ ₹2,299 रहा, जबकि सभी अस्पतालों को मिलाकर यह ₹14,775 तक पहुंच गया। ओपीडी इलाज के लिए 15 दिनों में औसत खर्च ₹861 रहा, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह करीब ₹281 तक सीमित रहा।

क्या है संकेत?

सर्वे साफ दिखाता है कि बीमा कवरेज बढ़ना सकारात्मक है, लेकिन यह अभी भी लोगों के जेब खर्च को पूरी तरह कम नहीं कर पाया है। सरकारी अस्पतालों की सस्ती सेवाएं राहत देती हैं, लेकिन निजी हेल्थकेयर पर निर्भरता खर्च को बढ़ा रही है।