म्यूचुअल फंड से ऐसे तैयार करें घर की डाउन पेमेंट, खरीदारी से पहले जानें पूरा प्लान
घर खरीदने का सपना पूरा करने के लिए सिर्फ होम लोन ही नहीं, डाउन पेमेंट की तैयारी भी जरूरी है। म्यूचुअल फंड के जरिए इस बड़े गोल के लिए कैसे प्लानिंग की जा सकती है, कौन-से फैक्टर ध्यान रखने चाहिए और निवेश करते समय किन बातों से बचना चाहिए, जानिए पूरी जानकारी।

In Short
- घर खरीदने की टाइमलाइन और डाउन पेमेंट की रकम तय करना म्यूचुअल फंड प्लानिंग का पहला कदम है।
- 1-3 साल, 3-5 साल और 5 साल से ज्यादा के गोल के हिसाब से अलग-अलग म्यूचुअल फंड कैटेगरी पर विचार किया जा सकता है।
- एसआईपी के जरिए नियमित निवेश करें और घर खरीदने का समय नजदीक आने पर कम रिस्क वाले ऑप्शन में शिफ्ट करने पर विचार करें।
घर खरीदना ज्यादातर लोगों की जिंदगी का बड़ा फाइनेंशियल गोल होता है। होम लोन से घर खरीदना आसान हो जाता है, लेकिन डाउन पेमेंट और बाकी शुरुआती खर्चों का इंतजाम खुद करना पड़ता है। इसके लिए कई लोग म्यूचुअल फंड को एक सेविंग ऑप्शन के तौर पर देखते हैं।
हालांकि इसमें निवेश करने से पहले समय, टारगेट अमाउंट और रिस्क को समझना जरूरी है।अगर आप भी म्यूचुअल फंड के जरिए घर की डाउन पेमेंट तैयार करना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको अपनी प्लानिंग को सही तरीके से समझना होगा।
सबसे पहले तय करें कब खरीदना है घर
होम डाउन पेमेंट के लिए म्यूचुअल फंड में निवेश शुरू करने से पहले यह तय करना जरूरी है कि आप घर कब खरीदना चाहते हैं। आपकी यह टाइमलाइन तय करती है कि आपका इन्वेस्टमेंट हॉराइजन कितना होगा और आप कितना मार्केट रिस्क ले सकते हैं।
अगर घर खरीदने का प्लान 3 से 5 साल बाद का है, तो ऐसा ऑप्शन चुना जा सकता है जिसमें ग्रोथ और स्टेबिलिटी के बीच बैलेंस रहे। वहीं अगर आपका गोल 5 साल से ज्यादा दूर है, तो लॉन्ग टर्म ग्रोथ के लिए अलग कैटेगरी के फंड्स पर विचार किया जा सकता है।घर खरीदने की टाइमलाइन तय होने के बाद अगला जरूरी कदम है डाउन पेमेंट की रकम का अनुमान लगाना।
डाउन पेमेंट के लिए कितना पैसा चाहिए, पहले करें तय
म्यूचुअल फंड से घर खरीदने की प्लानिंग में सबसे जरूरी है कि आपको पता हो कि कितनी रकम जमा करनी है। इसके लिए अपने पसंदीदा इलाके में प्रॉपर्टी प्राइस, घर का टाइप और डाउन पेमेंट की जरूरत को ध्यान में रखना चाहिए।
आरबीआई के लोन-टू-वैल्यू (एलटीवी) रेश्यो के अनुसार, 30 लाख रुपये तक के लोन पर 90% तक लोन अमाउंट, 30 लाख से 75 लाख रुपये तक के लोन पर 80% तक और 75 लाख रुपये से ज्यादा के लोन पर 75% तक लोन मिल सकता है।
आमतौर पर कई भारतीय शहरों में प्रॉपर्टी वैल्यू का 20%-25% हिस्सा डाउन पेमेंट के लिए अच्छा एस्टीमेट माना जा सकता है। इसके अलावा स्टांप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन और दूसरे खर्चों के लिए 5%-8% रकम अलग रखनी चाहिए।
टाइमलाइन के हिसाब से चुनें म्यूचुअल फंड कैटेगरी
घर खरीदने में कितना समय बचा है, उसी हिसाब से म्यूचुअल फंड कैटेगरी चुनना जरूरी है।
अगर आपका गोल 1 से 3 साल दूर है, तो आर्बिट्राज फंड्स और शॉर्ट ड्यूरेशन डेट फंड्स जैसे ऑप्शन पर विचार किया जा सकता है। ये शॉर्ट टर्म में कैपिटल सेफ्टी पर फोकस करते हैं।
3 से 5 साल के गोल के लिए कंजर्वेटिव हाइब्रिड फंड्स और बैलेंस्ड एडवांटेज फंड्स ग्रोथ और स्टेबिलिटी के बीच बैलेंस देने की कोशिश करते हैं।
वहीं 5 साल से ज्यादा समय के लिए लार्ज कैप फंड्स और फ्लेक्सी कैप फंड्स जैसे ऑप्शन पर विचार किया जा सकता है, क्योंकि लंबे समय में मार्केट फ्लक्चुएशन को संभालने का समय मिल सकता है।
एसआईपी से बनाएं डाउन पेमेंट का कॉर्पस
घर की डाउन पेमेंट के लिए एसआईपी के जरिए रेगुलर इन्वेस्टमेंट करना एक तरीका हो सकता है। एसआईपी में हर महीने छोटी रकम निवेश करके धीरे-धीरे बड़ा कॉर्पस तैयार किया जा सकता है।
एसआईपी का रुपी कॉस्ट एवरेजिंग फीचर मार्केट के उतार-चढ़ाव को मैनेज करने में मदद कर सकता है। इसके अलावा यह निवेश में डिसिप्लिन बनाए रखने में भी मदद करता है, क्योंकि हर महीने एक तय रकम इन्वेस्ट होती रहती है।
लेकिन सिर्फ निवेश करना काफी नहीं है, समय-समय पर अपने इन्वेस्टमेंट को चेक करना भी जरूरी है।
घर खरीदने के करीब आने पर करें बदलाव
अगर आपने डाउन पेमेंट के लिए इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में निवेश किया है और घर खरीदने का समय नजदीक आ रहा है, तो धीरे-धीरे कम रिस्क वाले ऑप्शन जैसे लिक्विड फंड्स या डेट म्यूचुअल फंड्स की तरफ शिफ्ट करने पर विचार किया जा सकता है।
इससे मार्केट में अचानक होने वाले बदलावों का असर आपके डाउन पेमेंट कॉर्पस पर कम हो सकता है।
म्यूचुअल फंड में रिस्क और टैक्स को समझना जरूरी
म्यूचुअल फंड्स में निवेश मार्केट रिस्क के साथ आता है। डेट म्यूचुअल फंड्स को इक्विटी फंड्स की तुलना में कम रिस्क वाला माना जाता है, लेकिन ये भी पूरी तरह रिस्क फ्री नहीं होते।
अगर डाउन पेमेंट के लिए म्यूचुअल फंड यूनिट्स रिडीम करते हैं, तो कैपिटल गेन पर टैक्स देना पड़ सकता है। इक्विटी फंड्स में 12 महीने के अंदर विदड्रॉल पर एसटीसीजी 20% और 12 महीने के बाद एलटीसीजी में 1.25 लाख रुपये से ज्यादा के गेन पर 12.5% टैक्स लागू होता है।
इसके अलावा प्रॉपर्टी प्राइस और होम बाइंग कॉस्ट समय के साथ बदल सकती है, इसलिए अपने टारगेट अमाउंट को समय-समय पर रिव्यू करना जरूरी है।
घर की डाउन पेमेंट के लिए रखें सही स्ट्रेटजी
म्यूचुअल फंड के जरिए घर की डाउन पेमेंट तैयार करने के लिए पहले टाइमलाइन तय करें, फिर टारगेट अमाउंट कैलकुलेट करें और अपनी रिस्क कैपेसिटी के हिसाब से सही फंड कैटेगरी चुनें।
एसआईपी के जरिए रेगुलर इन्वेस्टमेंट और समय पर पोर्टफोलियो रिव्यू करके आप अपने गोल के करीब पहुंच सकते हैं। हालांकि म्यूचुअल फंड रिटर्न मार्केट-लिंक्ड होते हैं और इनमें गारंटीड रिटर्न नहीं मिलता।

