UPA की NAC पर फिर छिड़ी बहस, Organiser ने ‘दिमागी नक्सल’ से जोड़कर किया बड़ा दावा
PM मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ बयान के बाद यह शब्द फिर सियासी चर्चा में है। RSS से जुड़ी पत्रिका Organiser ने अब UPA दौर की सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली NAC को भी इस बहस से जोड़ा है। संपादकीय में कई संस्थानों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं।

In Short
- PM मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ बयान के बाद Organiser ने सोनिया गांधी की अगुवाई वाली UPA दौर की NAC को इस बहस से जोड़ा।
- Organiser ने आरोप लगाया कि कथित ‘दिमागी नक्सल’ नौकरशाही, मीडिया, NGOs, शिक्षा और कानूनी व्यवस्था के जरिए प्रभाव बनाने की कोशिश करते हैं।
- किरेन रिजिजू ने सफाई दी कि PM मोदी का इशारा विपक्षी नेताओं की ओर नहीं, बल्कि माओवादियों और अलगाववादियों का समर्थन करने वालों की ओर था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक बहस के बीच RSS से जुड़ी साप्ताहिक पत्रिका Organiser ने अब UPA सरकार के दौरान बनी National Advisory Council (NAC) को भी इसके दायरे में रखा है।Organiser ने अपने ताजा अंक में सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली NAC को शासन व्यवस्था में कथित ‘दिमागी नक्सलियों’ के प्रभाव का उदाहरण बताया। संपादकीय में आरोप लगाया गया कि ऐसे लोग नौकरशाही, नीति निर्माण, कानूनी व्यवस्था, शिक्षा जगत, मीडिया और NGOs के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं।
PM Modi ने 15 अगस्त को क्या कहा था?
प्रधानमंत्री मोदी ने 15 अगस्त के संबोधन में कहा था कि जंगलों में हथियारबंद नक्सलवाद से निपटा गया है, लेकिन ‘नक्सली मानसिकता’ वाले लोग अब भी हिंसा और अशांति फैलाने के मौके तलाशते हैं। उन्होंने ऐसे ‘दिमागी नक्सलियों’ की पहचान कर उन्हें अलग-थलग करने की बात कही थी।
Organiser ने लगाए ये आरोप
Organiser के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने लिखा कि कथित ‘दिमागी नक्सली’ जरूरी नहीं कि बंदूक लेकर चलें। उनके मुताबिक, ऐसे नेटवर्क छात्र, महिला, मजदूर, किसान, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यकों से जुड़े संगठनों और संस्थाओं के जरिए काम करते हैं।संपादकीय में आरोप लगाया गया कि शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों और विकास जैसे मुद्दों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों के जरिए आखिर में हिंदुत्व और हिंदू सभ्यतागत पहचान को निशाना बनाया जाता है। इसमें बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, वकीलों, कार्यकर्ताओं, NGOs और कुछ टेक्नोलॉजी समूहों की भूमिका का भी दावा किया गया।
क्यों चर्चा में आई UPA की NAC?
NAC की स्थापना 2004 में UPA सरकार को नीतिगत मामलों पर सलाह देने के लिए हुई थी और सोनिया गांधी इसकी अध्यक्ष थीं। इसकी सिफारिशों ने National Rural Employment Guarantee Scheme, Right to Information Act, National Rural Health Mission और Mid-Day Meal Scheme जैसी कई सरकारी पहलों में योगदान दिया था।सोनिया गांधी ने 2006 में ऑफिस ऑफ प्रॉफिट विवाद के बीच NAC और लोकसभा से इस्तीफा दिया था। 2010 में परिषद के दोबारा गठन के बाद वह फिर इसकी अध्यक्ष बनीं।
Rijiju ने दी थी सफाई
प्रधानमंत्री के बयान पर विपक्ष के सवालों के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि मोदी विपक्षी नेताओं की बात नहीं कर रहे थे। उनके मुताबिक, यह शब्द उन लोगों के लिए था जो माओवादियों का समर्थन करते हैं, संविधान को नहीं मानते, अलगाववादियों का समर्थन करते हैं और Article 370 के पक्ष में हैं।Organiser के ताजा संपादकीय ने अब ‘दिमागी नक्सल’ की बहस को UPA के दौर की NAC और नीति निर्माण में सिविल सोसाइटी की भूमिका तक पहुंचा दिया है।

