माइनिंग पर मनमाना टैक्स नहीं लगा पाएंगे राज्य, केंद्र के नए बिल से बदल सकते हैं मिनरल टैक्स के नियम
मिनरल पर टैक्स लगाने के अधिकार को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच नई खींचतान शुरू हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले के बाद राज्यों को मिली ताकत पर अब केंद्र लिमिट तय करना चाहता है। नया बिल माइनिंग सेक्टर की टैक्स व्यवस्था में बड़ा बदलाव ला सकता है।

In Short
- केंद्र सरकार ने संसद में बिल पेश किया है, जिससे राज्यों के मिनरल टैक्स और दूसरी लेवी पर कंडीशन और लिमिट तय की जा सकेगी।
- अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को रॉयल्टी के अलावा माइनिंग पर अतिरिक्त लेवी लगाने का अधिकार दिया था।
- सरकार का कहना है कि ज्यादा और असमान टैक्स से माइनिंग कॉस्ट बढ़ रही है, जिससे इन्वेस्टमेंट घटने और मिनरल इंपोर्ट बढ़ने का खतरा है।
भारत में मिनरल और माइंस पर लगने वाले टैक्स और दूसरी लेवी के नियमों में बड़ा बदलाव हो सकता है। केंद्र सरकार चाहती है कि अलग-अलग राज्यों में अलग टैक्स व्यवस्था की वजह से माइनिंग कंपनियों की लागत बहुत ज्यादा न बढ़े। इसी मकसद से संसद में एक बिल पेश किया गया है, जो राज्यों की टैक्स लगाने की ताकत पर कुछ शर्तें और लिमिट तय करने का रास्ता खोलेगा। अब समझते हैं कि इस प्रस्ताव में क्या बदलने की तैयारी है और इसका असर राज्यों से लेकर माइनिंग सेक्टर तक कैसे पड़ सकता है।
राज्यों की टैक्स लगाने की ताकत पर लग सकती है लिमिट
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने संसद में एक बिल पेश किया है, जिसके जरिए माइनिंग से जुड़े कानूनों में बदलाव करने का प्रस्ताव है। इसके बाद केंद्र सरकार मिनरल राइट्स और मिनरल वाले लैंड पर राज्यों की ओर से लगाए जाने वाले टैक्स और दूसरी लेवी के लिए कंडीशन और लिमिट तय कर सकेगी।
सरकार का कहना है कि किसी माइंस पर लगने वाले सभी टैक्स और लेवी का कुल बोझ उसकी इकनॉमिक वैल्यू और प्रॉफिटेबिलिटी के मुकाबले जरूरत से ज्यादा नहीं होना चाहिए। यानी टैक्स इतना अधिक न हो जाए कि माइनिंग करना ही घाटे का सौदा बन जाए।
घरेलू मिनरल महंगा हुआ तो बढ़ सकता है इंपोर्ट
बिल में सरकार ने ज्यादा टैक्स का एक और खतरा बताया है। केंद्र के मुताबिक अगर देश में निकाला जाने वाला मिनरल ज्यादा महंगा हो गया तो पर्याप्त घरेलू भंडार होने के बावजूद कंपनियां विदेश से मिनरल इंपोर्ट करना शुरू कर सकती हैं।
सरकार की चिंता है कि अलग-अलग राज्यों में ज्यादा और असमान लेवी से मिनरल की कॉस्ट बढ़ती है। इससे घरेलू सप्लाई महंगी हो सकती है और लोकल माइनिंग सेक्टर की कॉम्पिटिटिवनेस पर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में राज्यों के हक में दिया था फैसला
यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है, जब करीब दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने मिनरल टैक्सेशन से जुड़े लंबे संवैधानिक विवाद में राज्यों के पक्ष में फैसला दिया था। अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्य रॉयल्टी के अलावा माइनिंग पर अतिरिक्त लेवी भी लगा सकते हैं।
फिलहाल माइंस और मिनरल डेवलपमेंट पर मुख्य कंट्रोल केंद्र सरकार का है, लेकिन राज्य सरकारों को निकाले गए मिनरल की मात्रा के आधार पर माइनर्स से अतिरिक्त लेवी वसूलने की इजाजत रही है।
केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ सकता है तनाव
नए प्रस्ताव से मिनरल से भरपूर राज्यों की चिंता बढ़ सकती है, क्योंकि माइनिंग से मिलने वाला टैक्स और लेवी उनके लिए कमाई का अहम जरिया हो सकता है। अगर केंद्र इन पर लिमिट तय करता है तो राज्यों को अपने रेवेन्यू पर असर पड़ने की आशंका हो सकती है।
केंद्र और राज्यों के रिश्तों में पहले से रेवेन्यू को लेकर खींचतान रही है। पिछले साल केंद्र की ओर से कंजम्प्शन टैक्स में अचानक कटौती के बाद राज्यों की कमाई पर असर पड़ने को लेकर भी सवाल उठे थे।
माइनिंग सेक्टर में इन्वेस्टमेंट बढ़ाना चाहती है सरकार
सरकार के मुताबिक इस अमेंडमेंट का मकसद माइनिंग सेक्टर के फिस्कल सिस्टम में स्टेबिलिटी और प्रेडिक्टेबिलिटी लाना है। आसान भाषा में कहें तो कंपनियों को पहले से पता हो कि उन्हें कितना टैक्स देना पड़ सकता है और अलग-अलग राज्यों में नियम बहुत ज्यादा न बदलें।
बिल में कहा गया है कि असमान और ज्यादा टैक्स माइनर्स की लागत बढ़ा रहे हैं। इससे कई प्रोजेक्ट फाइनेंशियली वायबल नहीं रह जाते और सेक्टर में नया इन्वेस्टमेंट भी प्रभावित होता है। सरकार अब इसी टैक्स बोझ को संतुलित कर पूरे देश में माइनिंग के लिए ज्यादा एक जैसी व्यवस्था बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है।

