Gen Z के लिए घर खरीदना क्यों बन रहा मुश्किल? बदलती सोच से बदल सकता है भारत का हाउसिंग मार्केट
भारत में घर खरीदने की पुरानी सोच बदल सकती है। महंगी प्रॉपर्टी, लंबे होम लोन और नौकरी की अनिश्चितता के बीच Gen Z किराये पर रहना ज्यादा पसंद कर सकती है। बदलते परिवार और नई निवेश आदतें आने वाले समय में हाउसिंग मार्केट की दिशा बदल सकती हैं।

In Short
- महंगी प्रॉपर्टी और नौकरी की अनिश्चितता से Gen Z लंबे समय तक घर खरीदने से बच सकती है।
- छोटे परिवार और विरासत में मिलने वाली प्रॉपर्टी बदल सकती है भारत में घरों की मांग।
- डेवलपर्स और होम लोन कंपनियों को बदलती युवा सोच के हिसाब से रणनीति बदलनी पड़ सकती है।
भारत में आने वाली नई पीढ़ी के लिए घर खरीदने का सपना पहले जैसा नहीं रह सकता है। महंगे घर, नौकरी को लेकर अनिश्चितता और बदलते परिवारों की वजह से Gen Z और युवा Millennials लंबे समय तक किराये के घर में रहना पसंद कर सकते हैं। इससे भारत के हाउसिंग मार्केट का तरीका बदल सकता है।
महंगे घर और नौकरी की अनिश्चितता से बढ़ सकता है किराये का चलन
आर्थिक विशेषज्ञ और लेखक विवेक कौल का कहना है कि आने वाली पीढ़ी के लिए घर खरीदना पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल हो सकता है। उन्होंने बताया कि आमदनी और प्रॉपर्टी की कीमतों के बीच बढ़ता अंतर युवाओं को लंबे समय के होम लोन से दूर कर सकता है।
20 या 30 साल के होम लोन की जिम्मेदारी लेना आसान नहीं होगा, खासकर तब जब नौकरी और इनकम को लेकर भरोसा कम हो। ऐसे में Gen Z और युवा Millennials घर खरीदने के बजाय किराये पर रहना, माता-पिता के साथ रहना या परिवार से मिलने वाले घर पर निर्भर रहना पसंद कर सकते हैं।
इसके अलावा युवाओं की सोच भी बदल रही है। कई लोग अपनी बचत को घर में लगाने के बजाय स्टॉक, म्यूचुअल फंड, गोल्ड या क्रिप्टो जैसे एसेट्स में निवेश करना ज्यादा पसंद कर सकते हैं।
छोटे परिवारों से बदल सकती है घरों की मांग
भारत में परिवारों का आकार भी धीरे-धीरे छोटा हो रहा है। शहरों में रहने वाले युवा परिवारों में बच्चों की संख्या कम हो रही है, जिसका असर भविष्य में घरों की जरूरत पर पड़ सकता है।
विवेक कौल के मुताबिक, आने वाले समय में शहरी परिवारों में औसतन एक बच्चा होने की संभावना है। ऐसे में हर पीढ़ी के लिए अलग नया घर खरीदने की जरूरत पहले जैसी नहीं रह सकती है।
इसके अलावा पुरानी पीढ़ी की प्रॉपर्टी भी भविष्य में हाउसिंग मार्केट का हिस्सा बन सकती है। भारत में कई ऐसे घर हैं जो इस्तेमाल में नहीं हैं या खाली पड़े हैं। आने वाले समय में ये प्रॉपर्टी बच्चों और पोते-पोतियों को मिल सकती हैं, जिससे नए घर खरीदने की जरूरत कम हो सकती है।
किराये के घरों और डेवलपर्स के लिए बदलेंगे मौके
अगर ज्यादा युवा घर खरीदने के बजाय किराये पर रहना चुनते हैं तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि हाउसिंग की मांग कम हो जाएगी। बल्कि घर रखने और इस्तेमाल करने का तरीका बदल सकता है।
ज्यादा लोग किराये पर रहेंगे तो मकान मालिकों और रेंटल हाउसिंग कंपनियों को फायदा मिल सकता है। प्रॉपर्टी की कीमत के मुकाबले मिलने वाला सालाना किराया यानी रेंटल यील्ड भी लोगों को घर किराये पर देने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।
वहीं, डेवलपर्स को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। उन्हें सिर्फ बड़े घरों के बजाय अफोर्डेबल हाउसिंग, रेंटल प्रोजेक्ट और छोटे व सुविधाजनक लिविंग स्पेस पर ज्यादा ध्यान देना पड़ सकता है।
होम लोन कंपनियों के सामने भी आ सकती है चुनौती
अगर युवा पीढ़ी लंबे समय तक घर खरीदने से दूर रहती है तो इसका असर होम लोन देने वाली कंपनियों पर भी पड़ सकता है। क्योंकि बड़ी संख्या में नए ग्राहक लंबे समय के लोन लेने से बच सकते हैं।
हालांकि विवेक कौल ने यह भी कहा कि Gen Z को लेकर की गई भविष्यवाणियों को पूरी तरह सच नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, भविष्य के अनुमान सिर्फ अंदाजे होते हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह नहीं है कि Gen Z कभी घर खरीदेगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या आने वाले समय में घर का मालिक होना भारत में आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा पैमाना बना रहेगा।

