क्या ईरान के खिलाफ अमेरिका करेगा न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल? बी61 बम से बढ़ी दुनिया की चिंता
ईरान के खिलाफ अमेरिका के संभावित न्यूक्लियर हथियार इस्तेमाल की चर्चा ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन बी61 बम से लेकर ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों तक, जानिए क्यों बढ़ रहा है परमाणु टकराव का खतरा और इसके क्या हो सकते हैं बड़े असर।

In Short
- अमेरिका में ईरान के खिलाफ टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन इस्तेमाल करने की चर्चा तेज हुई है।
- बी61 बम की ताकत 0.3 किलोटन से करीब 400 किलोटन तक हो सकती है।
- एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल वैश्विक तनाव बढ़ा सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिन का एमओयू खत्म होने से पहले न्यूक्लियर हथियारों के इस्तेमाल को लेकर चर्चा तेज हो गई है। पूर्व अमेरिकी सांसद मार्जरी टेलर ग्रीन ने दावा किया कि ईरान के खिलाफ न्यूक्लियर हथियारों के इस्तेमाल को लेकर अमेरिका में बड़ी रणनीतिक बैठकें चल रही हैं। हालांकि उन्होंने इसके समर्थन में कोई सबूत नहीं दिया। इसके बाद सवाल उठने लगे हैं कि अगर अमेरिका ऐसा कदम उठाता है तो उसके पास कौन से हथियार हैं और इसका असर कितना बड़ा हो सकता है।
ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर पहले भी हुआ हमला
अमेरिका ने पिछले साल 22 जून को ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के तहत ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर हमला किया था। अमेरिकी बी-2 एयरक्राफ्ट ने इस्फहान, नटांज और जमीन के अंदर बने फोर्डो कॉम्प्लेक्स को निशाना बनाया था। इस हमले में 14 टन वजन वाले जीबीयू-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर्स का इस्तेमाल किया गया था, जो अमेरिका के सबसे बड़े गैर-न्यूक्लियर हथियारों में शामिल हैं।
हमले के बाद भी बची ईरान की न्यूक्लियर क्षमता
अमेरिकी रणनीतिक समुदाय और आईएईए के आकलन के मुताबिक हमले से ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा, लेकिन उन्हें पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सका। माना जाता है कि ईरान के पास अभी भी करीब 440 किलो हाईली एनरिच्ड यूरेनियम मौजूद है, जिसमें 60 प्रतिशत तक यू-236 है। न्यूक्लियर हथियार बनाने के लिए करीब 90 प्रतिशत एनरिच्ड यूरेनियम की जरूरत होती है।
टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों का विकल्प
अगर अमेरिका ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों को खत्म करने के लिए न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल करता है तो उसके पास टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों का विकल्प हो सकता है। ये हथियार पूरे शहरों को तबाह करने वाले स्ट्रेटेजिक हथियारों से अलग होते हैं और खास सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए बनाए जाते हैं। इनकी ताकत 1 किलोटन से 100 किलोटन तक हो सकती है।
बी61 बम अमेरिका का सबसे खास हथियार
अमेरिका के पास बी61 थर्मोन्यूक्लियर बम है, जिसे टैक्टिकल न्यूक्लियर स्ट्राइक के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह बम 1963 से अमेरिकी न्यूक्लियर आर्सेनल का हिस्सा है। इसकी ताकत 0.3 किलोटन से करीब 400 किलोटन तक बदली जा सकती है, इसलिए इसे डायल-ए-यील्ड हथियार भी कहा जाता है।
बी61-12 और बी61-13 इसके दो प्रमुख वेरिएंट हैं। बी61-12 को नाटो न्यूक्लियर शेयरिंग प्रोग्राम के तहत जर्मनी, इटली, तुर्की, बेल्जियम और नीदरलैंड्स में रखा गया है। वहीं बी61-13 को बड़े और मजबूत सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने के लिए तैयार किया गया है।
अंडरग्राउंड ठिकानों पर भी कर सकता है असर
फेडरेशन ऑफ एटॉमिक साइंटिस्ट्स के मुताबिक बी61-13 अपनी ज्यादा ताकत और सटीकता के कारण जमीन के अंदर बने ठिकानों को निशाना बना सकता है। ग्राउंड-शॉक कपलिंग की वजह से इसकी ऊर्जा जमीन के अंदर पहुंच सकती है और इसका असर काफी ज्यादा हो सकता है।
हालांकि ईरान के ज्यादातर न्यूक्लियर ठिकाने दूरदराज इलाकों में हैं, फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल दुनिया में बड़े स्तर पर तनाव बढ़ा सकता है।
इतिहास में सिर्फ एक बार हुआ न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल
युद्ध में न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल सिर्फ एक बार हुआ है। अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर एटॉमिक बम गिराए थे। हिरोशिमा पर 15 किलोटन और नागासाकी पर 22 किलोटन का बम इस्तेमाल किया गया था।
अगर अमेरिका ईरान के खिलाफ टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल करता है तो यह इतिहास में दूसरी बार होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा कदम न्यूक्लियर एस्केलेशन का खतरा बढ़ा सकता है और वैश्विक सुरक्षा पर बड़ा असर डाल सकता है।

