टाटा ग्रुप की कमान अब किसके हाथ में होगी? चंद्रशेखरन के जाने से 120 अरब डॉलर के प्लान पर सवाल
टाटा ग्रुप में नेतृत्व बदलाव की आहट तेज हो गई है। एन चंद्रशेखरन के दोबारा चेयरमैन बनने से इनकार के बाद अब नए उत्तराधिकारी की तलाश शुरू होगी। इस फैसले के बीच टाटा ट्रस्ट्स, बोर्ड विवाद, बड़े निवेश प्लान और ग्रुप की भविष्य की रणनीति पर सबकी नजर है।

In Short
- एन चंद्रशेखरन ने फरवरी 2027 के बाद टाटा संस चेयरमैन पद पर दोबारा नियुक्ति नहीं लेने का फैसला किया।
- टाटा ट्रस्ट्स की हिस्सेदारी, टाटा संस लिस्टिंग और बोर्ड संरचना को लेकर मतभेद की खबरें सामने आईं।
- 120 अरब डॉलर के निवेश प्लान और बड़े प्रोजेक्ट्स की रफ्तार पर नए नेतृत्व का असर पड़ सकता है।
टाटा ग्रुप में नेतृत्व को लेकर बड़ा बदलाव सामने आया है। एन चंद्रशेखरन ने फरवरी 2027 में खत्म होने वाले अपने कार्यकाल के बाद दोबारा चेयरमैन बनने से इनकार कर दिया है। उनके जाने के बाद ग्रुप के सामने नया लीडर चुनने की चुनौती है, क्योंकि अभी तक कोई साफ उत्तराधिकारी तय नहीं है। यही बदलाव अब टाटा ग्रुप के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े कर रहा है।
चंद्रशेखरन ने क्यों छोड़ा पद?
एन चंद्रशेखरन ने बुधवार को बताया कि वह अपने 5 साल के कार्यकाल के बाद दोबारा नियुक्ति नहीं मांगेंगे। उन्होंने कहा कि फरवरी 2026 की बोर्ड मीटिंग में टाटा संस के एक बोर्ड सदस्य ने उनके कार्यकाल बढ़ाने का समर्थन नहीं किया था।
इससे पहले सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट ने सर्वसम्मति से उनका कार्यकाल बढ़ाने की सिफारिश की थी। लेकिन करीब 6 महीने तक इस मामले पर कोई फैसला नहीं हो सका। चंद्रशेखरन ने नेतृत्व में स्पष्टता की जरूरत बताई, क्योंकि ग्रुप के कई बड़े प्रोजेक्ट महत्वपूर्ण चरण में हैं।
टाटा ग्रुप में पावर स्ट्रगल की चर्चा
चंद्रशेखरन के फैसले के बाद टाटा ग्रुप के अंदर चल रही नेतृत्व की खींचतान फिर चर्चा में आ गई है। सबसे बड़ा मुद्दा टाटा संस की दिशा और भविष्य की रणनीति को लेकर बताया जा रहा है।
टाटा ट्रस्ट्स, जो टाटा संस में करीब 66% हिस्सेदारी रखते हैं, ग्रुप के फैसलों पर बड़ा प्रभाव रखते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक नोएल टाटा ने टाटा संस की संभावित पब्लिक लिस्टिंग को लेकर स्पष्टता मांगी थी। साथ ही ग्रुप के कर्ज और भविष्य की रणनीति को लेकर भी चिंताएं जताई गई थीं।
इस दौरान रतन टाटा के करीबी माने जाने वाले कई लोग ग्रुप से अलग हो चुके हैं, जिनमें विजय सिंह और मेहली मिस्त्री शामिल हैं। इसके अलावा बोर्ड में सीटों के बंटवारे और सर रतन टाटा ट्रस्ट में नोएल टाटा के बेटे नेविल टाटा की नियुक्ति को लेकर भी मतभेद की खबरें सामने आई थीं।
चंद्रशेखरन के जाने का टाटा ग्रुप पर असर
अब चंद्रशेखरन के हटने के बाद सबसे बड़ी जिम्मेदारी नोएल टाटा पर होगी। उन्हें शेयरहोल्डर्स, रेगुलेटर्स और सरकार के बीच भरोसा बनाए रखना होगा कि टाटा ग्रुप अपनी योजनाओं पर आगे बढ़ रहा है।
चंद्रशेखरन के नेतृत्व में टाटा ग्रुप ने एयर इंडिया को संभालने और टीसीएस को ग्लोबल स्तर पर मजबूत करने जैसे बड़े कदम उठाए। अब नए नेतृत्व के सामने इन योजनाओं को आगे बढ़ाने की चुनौती होगी।
120 अरब डॉलर के निवेश प्लान पर भी असर
चंद्रशेखरन के जाने से अगले 5 साल के करीब 120 अरब डॉलर के खर्च वाले प्लान पर भी असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ बड़े प्रोजेक्ट में देरी हो सकती है या उनकी रफ्तार धीमी हो सकती है।
इन प्रोजेक्ट्स में सेमीकंडक्टर फैब प्लांट, एयरलाइन बिजनेस और नया कंज्यूमर टेक्नोलॉजी वेंचर शामिल हैं। बोर्ड अब इन निवेशों से मिलने वाले भविष्य के फायदे को लेकर ज्यादा भरोसा चाहता है।
वहीं नोएल टाटा ज्यादा संतुलित तरीके से आगे बढ़ने, जल्दी रिटर्न देने वाले प्रोजेक्ट्स और कम जोखिम वाले निवेश पर जोर देते हैं। ऐसे में नए चेयरमैन के सामने टाटा ग्रुप की पुरानी विरासत और भविष्य की महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।

