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कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग, भारतीय क्रूड बास्केट $146 के पार, क्या और महंगी होगी जेब?

भारतीय क्रूड ऑयल बास्केट की कीमत उछलकर $146.09 प्रति बैरल पर पहुंच गई है। यह उछाल ईरान, कतर और सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हुए मिसाइल हमलों के बाद देखने को मिला है।

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In Short

  • मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारतीय क्रूड कीमत $146 प्रति बैरल पहुंची, भारी उछाल
  • महंगाई, CAD और कॉर्पोरेट मुनाफे पर दबाव बढ़ने का खतरा
  • एक्सपर्ट्स ने निवेशकों को सतर्क रहने और क्वालिटी स्टॉक्स पर फोकस की सलाह दी

Oil Prices: पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के संकट ने भारत की आर्थिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारतीय क्रूड ऑयल बास्केट की कीमत उछलकर $146.09 प्रति बैरल पर पहुंच गई है।

यह उछाल ईरान, कतर और सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हुए मिसाइल हमलों के बाद देखने को मिला है। फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए ईरान युद्ध ने ग्लोबल ऑयल मार्केट में हड़कंप मचा दिया है, जिससे मार्च महीने में भारतीय क्रूड का औसत भाव $111.39 प्रति बैरल रहा। यह पिछले महीने के औसत ($69.01) के मुकाबले करीब 61.4% की भारी बढ़ोतरी है।

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महंगाई और व्यापार घाटे पर खतरा

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है, ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में लगी यह आग घरेलू महंगाई को बढ़ा सकती है। फरवरी में थोक महंगाई दर (WPI) पहले ही 11 महीने के उच्चतम स्तर 2.1% पर पहुंच गई थी।

नुवामा इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज के विश्लेषकों का कहना है कि यह 'सप्लाई-बेस्ड शॉक' भारत के लिए बेहद खतरनाक है। उनके मुताबिक, पश्चिम एशिया भारत के लिए रूस-यूक्रेन से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे कुल निर्यात का 15% और विदेशी प्रेषण (Remittances) का 40% हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। तेल की इन कीमतों से चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ने का बड़ा जोखिम पैदा हो गया है।

कॉर्पोरेट मुनाफे और रिकवरी पर असर

जानकारों का मानना है कि तेल के इस झटके से कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन में कमी आएगी और देश की आर्थिक रिकवरी की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। हाल ही में एलपीजी की किल्लत से 10 से ज्यादा सेक्टर प्रभावित हुए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, बीएसई 500 की करीब 35% कंपनियां इस संकट की वजह से सूक्ष्म स्तर की समस्याओं का सामना कर रही हैं।

एक्सिस सिक्योरिटीज के रिसर्च हेड राजेश पालविया का कहना है कि हालांकि भारत की बुनियादी ग्रोथ मजबूत है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें ही अब भारत की महंगाई और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाली सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन गई हैं।

वैश्विक बाजार और ब्याज दरों का गणित

केवल भारत ही नहीं, बल्कि अमेरिका भी इस संकट से परेशान है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने संकेत दिया है कि ईरान संकट के कारण महंगाई बढ़ रही है, जिससे 2026 में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें कम हो गई हैं।

एक्सपर्ट का कहना है कि 1990 के खाड़ी युद्ध के मुकाबले आज अमेरिका की स्थिति अलग है; उन पर कर्ज का बोझ बहुत ज्यादा है और रक्षा खर्च से ज्यादा उन्हें ब्याज चुकाना पड़ रहा है। ऐसे में वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारतीय निवेशकों को सतर्क रहने और पोर्टफोलियो में क्वालिटी शेयरों पर ध्यान देने की सलाह दी जा रही है।