मानसून 2026: अल-नीनो के बीच कमजोर बारिश का अलर्ट, कृषि पर खतरा बढ़ा, क्या बढ़ेगी मंहगाई?
भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 2026 केरल में थोड़ी देरी से पहुंचा और शुरुआती बारिश कमजोर रही. आईएमडी ने 90-92 प्रतिशत बारिश का अनुमान लगाया है। इस वजह से जुलाई से नवंबर के बीच खेती, पानी और महंगाई की संकट बढ़ने लगा है।

In Short
- केरल में मानसून देरी से पहुंचा और शुरुआती बारिश कमजोर रही
- अल-नीनो अलर्ट: मानसून 2026 में कमजोर बारिश की आशंका
- महाराष्ट्र में 70-80 प्रतिशत कम बारिश ने किसानों की चिंता
- कमजोर मानसून का खतरा, कई राज्यों में सूखे जैसे हालात
भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 की शुरुआत जून में केरल पहुंचने के साथ हुई, लेकिन इस बार बारिश की रफ्तार सामान्य से धीमी बनी हुई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार इस पूरे मानसून सीजन में बारिश औसत से कम रह सकती है। यह करीब 90 से 92% लॉन्ग पीरियड एवरेज के आसपास रहने का अनुमान लगाया गया है। जिस वजह से देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बनने का खतरा बना हुआ है।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी अल-नीनो का असर सामने नहीं आया है, लेकिन जुलाई से नवंबर 2026 के बीच इसका प्रभाव तेज हो सकता है। शुरुआती संकेतों में महाराष्ट्र और कई राज्यों में 70–80% तक बारिश की कमी दर्ज की गई है, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो रही है। मानसून की बेरुखी की वजह से किसानों की चिंता बढ़ गई है।
अल-नीनो और मानसून पर असर
अल-नीनो एक जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इससे ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ती हैं और भारत की ओर आने वाली नमी वाली हवाओं का प्रवाह प्रभावित होता है। नतीजतन, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून कमजोर हो सकता है। भारत में मानसून देश की लगभग 70% वार्षिक बारिश का स्रोत है, इसलिए इसमें गिरावट का असर सीधा कृषि, जल संसाधन और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
बारिश का अनुमान और राहत की बात
IMD और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार 2026 में अल-नीनो जुलाई-अगस्त में मध्यम और बाद में मजबूत हो सकता है। कई वर्षों के रिकॉर्ड बताते हैं कि ऐसे हालात में भारत को औसत से कम बारिश होती है। इस बार सकारात्मक भारतीय महासागर द्विध्रुव न्यूट्रल है, जो कुछ राहत दे सकता है लेकिन पूरी तरह असर कम नहीं होगा।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर दबाव
कम बारिश से धान, मक्का, कपास और दालों जैसी खरीफ फसलों पर असर पड़ सकता है। अनुमान है कि उत्पादन में 10–15% तक गिरावट संभव है, जिससे खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं। जल संकट, बिजली उत्पादन में कमी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ने की आशंका है।

