युद्ध, ऊर्जा संकट और निवेश की चुनौतियों के बीच भारत कैसे गढ़ रहा है टिकाऊ विकास का नया मॉडल
बिजनेस टुडे ने पिछले साल की तरह इस बार भी ‘इंडियाज मोस्ट सस्टेनेबल कंपनीज 2026’ की लिस्ट जारी की है। यह सूची उन कंपनियों को सम्मानित करती है जिन्होंने यह साबित किया है कि स्थिरता और टिकाऊपन को केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि मुख्य कारोबारी रणनीति का हिस्सा बनाया जा सकता है।

सिद्धार्थ जराबी, ग्रुप एडिटर बिजनेस टुडे - संपादकीय
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हवाई हमलों के बाद शुरू हुआ संघर्ष भारत और पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा चेतावनी संकेत साबित हुआ। इसके बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी ने ग्लोबल स्तर पर तेल और गैस की आपूर्ति को गंभीर रूप से प्रभावित किया, जिसके चलते कीमतों में लगातार अस्थिरता देखने को मिली। इस संकट ने कई महत्वपूर्ण सबक दिए हैं, जिनमें सबसे अहम है आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था और टिकाऊ (सस्टेनेबल) व्यवसायों के निर्माण की आवश्यकता।
इसी सोच को ध्यान में रखते हुए, बिजनेस टुडे ने पिछले साल की तरह इस बार भी ‘इंडियाज मोस्ट सस्टेनेबल कंपनीज 2026’ की लिस्ट जारी की है। यह सूची उन कंपनियों को सम्मानित करती है जिन्होंने यह साबित किया है कि स्थिरता और टिकाऊपन को केवल एक सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि मुख्य कारोबारी रणनीति का हिस्सा बनाया जा सकता है।
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इस वैल्यूएशन प्रक्रिया में तेल एवं गैस, ऑटोमोबाइल, सीमेंट, बैंकिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर समेत एक दर्जन से अधिक क्षेत्रों की 1,000 से ज्यादा लिस्टेड कंपनियों का आकलन किया गया। इनमें से लास्ट तक पहुंचने वाली 255 कंपनियों में से विजेताओं का चयन एक्सपर्ट की जूरी ने किया।
इस लेटेस्ट एडिशन में बिजनेस टुडे की पत्रकार ऋचा शर्मा ने विस्तार से बताया है कि भारत किस तरह अपनी तत्काल ऊर्जा जरूरतों और लॉन्गटर्म क्लाइमेट प्रतिबद्धताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच कोयला गैसीकरण (Coal Gasification) को ऊर्जा सुरक्षा और ग्रिड स्थिरता बनाए रखने के लिए एक अंतरिम समाधान के रूप में देखा जा रहा है, जबकि देश रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता का लगातार विस्तार भी कर रहा है।
इसी मुद्दे पर SEBI के पूर्णकालिक सदस्य और BRSR फ्रेमवर्क के प्रमुख अमरजीत सिंह ने कहा कि अब जलवायु परिवर्तन और स्थिरता से जुड़े खतरे सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गए हैं। ये तेजी से आर्थिक और वित्तीय जोखिम बनते जा रहे हैं। उनका असर कंपनियों के बिजनेस मॉडल, संपत्तियों की वैल्यू और भविष्य में विकास की संभावनाओं पर भी पड़ रहा है।
ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव की चुनौती सिर्फ पेट्रोल-डीजल के विकल्प खोजने तक सीमित नहीं है। बिजनेस टुडे के पत्रकार करण धर की रिपोर्ट बताती है कि सरकार पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाकर विदेशी तेल पर निर्भरता कम करना और किसानों की आय बढ़ाना चाहती है। लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। E85 और E100 जैसे ज्यादा एथेनॉल वाले ईंधन उन गाड़ियों में तकनीकी दिक्कतें पैदा कर सकते हैं, जो इसके लिए तैयार नहीं हैं। वहीं एथेनॉल बनाने के लिए मक्का जैसी फसलों की मांग बढ़ने से उनकी उपलब्धता और कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है।
एथेनॉल को लेकर एक दूसरे आर्टिकल में बिजनेस टुडे के पत्रकार प्रसन्ना मोहंती ने इसकी लंबी अवधि की उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अगर एथेनॉल का इस्तेमाल बहुत बड़े स्तर पर बढ़ाया गया, तो इसका असर खेती के पैटर्न पर पड़ सकता है। किसान ज्यादा एथेनॉल वाली फसलों की तरफ रुख कर सकते हैं, जिससे खाद्यान्न उत्पादन और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
वहीं बिजनेस टुडे की पत्रकार सुरभि ने वायु प्रदूषण से होने वाले आर्थिक नुकसान पर प्रकाश डाला है। उन्होंने IMF की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ की उस चेतावनी का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि लगातार बढ़ता प्रदूषण अर्थव्यवस्था के लिए टैरिफ या व्यापारिक रुकावटों से भी बड़ा खतरा बन सकता है, क्योंकि इसका सीधा असर लोगों की सेहत, उत्पादकता और आर्थिक विकास पर पड़ता है।
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सिर्फ पर्यावरण को बचाना ही काफी नहीं है, आर्थिक और वित्तीय मजबूती भी उतनी ही जरूरी है। सुरभि और नचिकेत केलकर ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 2026 में भारत में रिकॉर्ड स्तर का सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) आया, लेकिन इसके बावजूद नेट इंवेस्टमेंट फ्लो उम्मीद के मुताबिक मजबूत नहीं रहा। उन्होंने इस विरोधाभास के पीछे की वजहों का विश्लेषण किया है।
कुल मिलाकर यह स्पेशल एडिशन दिखाता है कि स्थिरता सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा, एथेनॉल जैसे वैकल्पिक ईंधन, साफ हवा और निवेश- ये सभी एक दूसरे से जुड़े हुए मुद्दे हैं और देश के टिकाऊ विकास के लिए इन पर साथ-साथ काम करना जरूरी है।