इंडिगो के बाद अब एयर इंडिया भी खोज रही है विदेश सीईओ! इंडियन एयरलाइन्स को फॉरेन CEOs पर भरोसा क्यों?
एयर इंडिया और इंडिगो ग्लोबल विस्तार के लिए विदेशी सीईओ पर दांव लगा रही हैं। कंपनियों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय अनुभव से लंबी दूरी की उड़ानों और लागत नियंत्रण में मदद मिलेगी, जबकि विशेषज्ञ इसे देसी टैलेंट की अनदेखी और इंडस्ट्री की रणनीतिक जरूरतों से जोड़कर देख रहे हैं।

भारतीय विमानन क्षेत्र में इन दिनों बड़े बदलाव की सुगबुगाहट है। देश की दो सबसे बड़ी एयरलाइंस, एयर इंडिया और इंडिगो, अपने भविष्य की कमान अंतरराष्ट्रीय दिग्गजों के हाथों में सौंप रही हैं।
कैंपबेल विल्सन के इस्तीफे के बाद अब एयर इंडिया एक नए विदेशी चेहरे की तलाश में है। वहीं, इंडिगो ने हाल ही में आईएटीए (IATA) के महानिदेशक विली वॉल्श को अपना अगला सीईओ नियुक्त कर सबको चौंका दिया है। पिछले महीने ही पीटर एल्बर्स ने इंडिगो के सीईओ पद से इस्तीफा दिया था।
एयर इंडिया के सूत्रों के मुताबिक, कंपनी पिछले कुछ महीनों से एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ को खोज रही है जो एयरलाइन को नई ऊंचाइयों पर ले जा सके। एयर इंडिया के बोर्ड ने विल्सन के उत्तराधिकारी की तलाश के लिए एक विशेष समिति भी बना दी है। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर भारतीय कंपनियां देसी टैलेंट के बजाय विदेशी अधिकारियों पर इतना भरोसा क्यों जता रही हैं?
इंडियन एयरलाइन्स को विदेशी सीईओ पर भरोसा क्यों?
विमानन विशेषज्ञ और एविएलाज (Avialaz) के सीईओ संजय लाजर कहते हैं कि पिछले तीन दशकों में भारतीय विमानन क्षेत्र ने वुल्फगैंग प्रोक शॉयर, नील मिल्स और गुस्ताव बाल्डौफ जैसे कई विदेशी चेहरों को मौका दिया है। हालांकि, इनमें से कई अधिकारियों का कार्यकाल विवादों से भी घिरा रहा है।
संजय लाजर का मानना है कि भारतीय विमानन उद्योग में आंतरिक प्रतिभा की कमी होने की एक गलत धारणा बनी हुई है। वे कहते हैं कि हमारे पास आदित्य घोष, संजीव कपूर और माइकल मस्कारेन्हास जैसे बड़े नाम मौजूद हैं, लेकिन अक्सर आंतरिक राजनीति और असुरक्षा की भावना के कारण देसी टैलेंट पिछड़ जाता है। उनके अनुसार, कई बार बड़े मालिकों के साथ तालमेल न बैठ पाने के कारण भारत का बेहतरीन टैलेंट विदेशों में जाकर काम करने को मजबूर हो जाता है, जिससे देश में विदेशी सीईओ को बुलाने की नौबत आती है।
इंडिगो और एयर इंडिया दोनों ने ही विमानों के बड़े ऑर्डर दिए हैं, जिनमें अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए इस्तेमाल होने वाले वाइड-बॉडी विमान शामिल हैं। घरेलू बाजार में कड़ी प्रतिस्पर्धा और मुनाफे की कमी को देखते हुए कंपनियां अब अंतरराष्ट्रीय रूट पर ध्यान दे रही हैं।
एयरलाइंस को लगता है कि विदेशी सीईओ के आने से न केवल उनकी ब्रांड वैल्यू बढ़ती है, बल्कि उन्हें लंबी दूरी की उड़ानों को किफायती तरीके से चलाने का अनुभव भी मिलता है। मिसाल के तौर पर, विली वॉल्श को ब्रिटिश एयरवेज और एयर लिंगस में लागत कटौती (Cost-cutting) की उनकी आक्रामक रणनीति के लिए जाना जाता है, जो इंडिगो के विस्तार में मददगार साबित हो सकती है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले सालों में घरेलू विमानन क्षेत्र की वृद्धि एक अंक तक सीमित रह सकती है, जबकि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में दोहरे अंकों में बढ़त की संभावना है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार से ज्यादा कमाई करने की होड़ ने भारतीय विमानन कंपनियों को वैश्विक दिग्गजों की शरण में जाने पर मजबूर कर दिया है।