क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया? हरीश राणा मामले में सुप्रीम कोर्ट का इच्छामृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला

आज सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में पहली बार 2018 के कॉमन कॉज जजमेंट के तहत पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दी है।

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By Gaurav Kumar:

Passive Euthanasia: आज सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में पहली बार 2018 के कॉमन कॉज जजमेंट के तहत पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दी है।

कोर्ट ने हरीश राणा के पिता द्वारा दायर दयार्ता याचिका पर सुनवाई करते हुए हरीश राणा को उनकी 13 साल लंबी पीड़ा से मुक्त करने का फैसला लिया है। जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच द्वारा लिया गया यह फैसला भारत के न्याय सिस्टम में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।

क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया?

जब किसी मरीज को मिलने वाला उपचार रोक दिया जाता है, जिससे उसकी मृत्यु हो जाए, उसे पैसिव यूथेनेशिया कहते हैं। पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति अक्सर उन मरीजों को दी जाती है जो लंबे समय से किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हों और उनकी हालत में सुधार की संभावना न बची हो। ऐसे मामलों में मरीज को गरिमापूर्ण तरीके से अपने जीवन का अंत करने की अनुमति प्रदान की जाती है।

कितने प्रकार के होते हैं यूथेनेशिया?

यूथेनेशिया दो प्रकार के होते हैं- एक्टिव यूथेनेशिया (Active Euthanasia)  और पैसिव यूथेनेशिया। एक्टिव यूथेनेशिया में बीमार व्यक्ति को डॉक्टर जहरीली दवा या इंजेक्शन देकर मृत्यु देते हैं। वहीं पैसिव यूथेनेशिया में बीमार व्यक्ति का उपचार रोक दिया जाता है।

हरीश राणा इच्छामृत्यु मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक्टिव और पैसिव यूथेनेशिया के बीच के अंतर को भी स्पष्ट किया है, क्योंकि एक्टिव यूथेनेशिया (दवा देकर मौत) भारत में अवैध है, जबकि पैसिव यूथेनेशिया (लाइफ सपोर्ट हटाना) अनुमति योग्य है।

कोर्ट ने कहा कि परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (Permanent Vegetative State) में रहने वाले मरीज पैसिव यूथेनेशिया के योग्य हो सकते हैं, अगर इसके लिए प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड सहमत हों।

कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने आदेश दिया है कि हरीश को एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में भर्ती किया जाएगा, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनके उपचार को धीरे-धीरे बंद किया जाएगा। कोर्ट ने साफ किया है कि यह पूरी प्रक्रिया गरिमा के साथ और मेडिकल व एथिकल प्रोटोकॉल का पालन करते हुए ही की जानी चाहिए।

एम्स के डॉक्टरों की रिपोर्ट में बताया गया था कि हरीश की हालत में सुधार की कोई संभावना नहीं है। इस पर कोर्ट ने माना कि यह फैसला मुश्किल है, लेकिन हरीश को इस तरह की पीड़ा में लगातार रखना भी उचित नहीं है।

क्या है हरीश राणा का केस?

2013 में हरीश राणा चंडीगढ़ में अपनी पढ़ाई के दौरान चौथी मंजिल से गिर गए थे। इसके बाद से ही वह 13 वर्षों से बेहोशी की हालत में हैं। इस दुर्घटना में उनके दिमाग पर गंभीर चोट लगी, जिसके कारण वह पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट नाम की मेडिकल कंडीशन में चले गए। इसके कारण वह बिस्तर से उठ नहीं पाए और 100 प्रतिशत विकलांग हो गए।

समय के साथ उनकी हालत बिगड़ती गई और उनके स्वस्थ होने की उम्मीद भी कम होती चली गई। अपने बेटे की ऐसी हालत देखकर उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया था कि उनके बेटे को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने एम्स की मेडिकल रिपोर्ट्स के आधार पर हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। अब यह मामला गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार के तहत पैसिव यूथेनेशिया को कोर्ट की पहली मंजूरी माना जा रहा है।

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