चौंकाने वाला खुलासा
आप जो खा रहे हैं उस पर भरोसा है? फूड पैकेट्स के दावों पर चौंकाने वाली रिपोर्ट - हर 3 में 1 दावा निकला झूठा
हाल ही में लेबलब्लाइंड (LabelBlind) नाम की एक डिजिटल फूड लेबलिंग कंपनी ने अपनी 2025-2026 में की गई रिसर्च में काफी चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश की है। चलिए जानते हैं इस रिपोर्ट में क्या कहा गया है।

ज्यादातर लोग कोई भी पैकेज्ड फूड आइटम खरीदते समय उसकी एक्सपायरी डेट को चेक करते हैं, लेकिन शायद ऐसे बहुत ही कम लोग होंगे जो फूड प्रोडक्ट की पैकेजिंग में किए गए दावों पर कभी गौर करते हों।
इसी मामले को लेकर एक बड़ी खबर सामने आ रही है। हाल ही में लेबलब्लाइंड (LabelBlind) नाम की एक डिजिटल फूड लेबलिंग कंपनी ने अपनी 2025-2026 में की गई रिसर्च में काफी चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश की है। चलिए जानते हैं इस रिपोर्ट में क्या कहा गया है।
लेबलब्लाइंड कंपनी ने 227 ब्रांड्स के करीब 586 पैकेज्ड प्रोडक्ट्स पर किए गए 5085 क्लेम पर रिसर्च की। इस रिसर्च के बाद कंपनी ने अपने नतीजों में बताया कि करीब 33.6 प्रतिशत किए गए दावे या तो पूरी तरह से स्टैंडर्ड्स को पूरा करने वाले नहीं थे या फिर उनके द्वारा किए गए दावे बिना किसी आधार के थे।
इसका मतलब हुआ कि हर तीन में से किया गया एक दावा तय स्टैंडर्ड्स पर खरा नहीं उतरता, जो आम लोगों को भ्रमित कर सकता है। सबसे ज्यादा बुरी हालत तो हेल्थ से जुड़े दावों की है।
कई मामलों में कंपनियां एफएसएसएआई (FSSAI) के नियमों, एएससीआई (ASCI) और भारतीय उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 ( Indian Consumer Protection Act, 2019) के निर्देशों का पालन नहीं कर रही हैं।
लेबलब्लाइंड के मुताबिक कंपनियां अपनी पैकेजिंग में जरूरत से कई ज्यादा बड़े दावे कर रही हैं, वो भी बिना किसी सबूत के। हर एक प्रोडक्ट पर कम से कम 8 से 9 दावे किए जा रहे हैं। प्रोटीन पाउडर और न्यूट्रिशन से जुड़े प्रोडक्ट्स में तो यह आंकड़ा 17 से भी ऊपर पाया गया है।
क्या होती है फूड लेबलिंग?
फूड लेबलिंग एक कानूनी प्रक्रिया है। इसका लक्ष्य लोगों को उस प्रोडक्ट से जुड़ी जरूरी जानकारी देना होता है। इसमें न केवल उस प्रोडक्ट में इस्तेमाल की गई चीजों की जानकारी होती है, बल्कि साथ ही उस प्रोडक्ट से मिलने वाली न्यूट्रिशनल वैल्यू के बारे में भी बताया जाता है।
ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि लोगों को इस बात की जानकारी हो कि जो प्रोडक्ट वे खरीद रहे हैं, उसे बनाने के लिए कंपनी ने क्या-क्या चीजें इस्तेमाल की हैं। एफएसएसएआई इन सभी प्रोडक्ट्स के लिए स्टैंडर्ड तय करता है और उनकी निगरानी भी करता है।
लेबलब्लाइंड की फाउंडर और सीईओ रशीदा वापीवाला (Rashida Vapiwala) कहती हैं कि फूड लेबलिंग कस्टमर्स और कंपनियों के बीच बातचीत का एक जरिया है, जिसमें कंपनी अपने कस्टमर को अपने प्रोडक्ट की जानकारी देती है। ऐसे में जानकारी का स्पष्ट और विश्वसनीय होना जरूरी हो जाता है। ऐसा न होने पर यह कानून का उल्लंघन तो है ही, बल्कि साथ ही लोगों की जिंदगी से भी खिलवाड़ है।
कैसे तोड़ती हैं कंपनियां लेबलिंग के कानून?
कंपनियों को फूड प्रोडक्ट के लेबल एफएसएसएआई के नियमों, एएससीआई के स्टैंडर्ड्स और ग्राहक सुरक्षा कानून द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करना होता है। हालांकि कंपनियां अक्सर इन नियमों को अलग-अलग तरीकों से तोड़-मरोड़ देती हैं, जैसे बड़े-बड़े दावे करना या गलत जानकारी देना। उदाहरण के लिए कोई कंपनी अपने फूड प्रोडक्ट को आयरन से भरपूर होने का दावा करती है, लेकिन अगर उसके लेबल में लिखा है कि उस आइटम में आयरन 30 प्रतिशत से कम है, तो कंपनी का दावा गुमराह करने वाला माना जाएगा।
बच्चों से जुड़े प्रोडक्ट्स का कैसा है हाल?
कंपनी ने बच्चों के लिए बनाए जाने वाले प्रोडक्ट्स पर भी रिसर्च की और यह पाया कि बच्चों के लिए बनने वाले स्नैक्स प्रोडक्ट्स में किए गए 27.3 प्रतिशत दावे नियमों पर खरे नहीं उतरे।
हालांकि एक अच्छी खबर जो उनकी रिसर्च में सामने आई, वह यह है कि नाश्ते में खाए जाने वाले प्रोडक्ट्स की कैटेगरी में 89 प्रतिशत प्रोडक्ट्स तय स्टैंडर्ड्स पर खरे उतरे। इसके साथ ही केक, पैनकेक जैसे पहले से बनकर तैयार रहने वाले फूड आइटम्स में दावे कम थे और इनके नतीजे बाकी आइटम्स के मुकाबले बेहतर थे।