कच्चा तेल 100 डॉलर पार! क्या वेस्ट एशिया युद्ध से भारत में बढ़ेगी महंगाई? वित्त मंत्री ने दिया जवाब

वेस्ट एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव की वजह से कच्चे तेल का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल पार कर गए हैं। सरकार ने पिछले महीने ही अपने केंद्रीय बजट पेश किया था, हालांकि अब बढ़ती हुई तेल की कीमतों से सरकार का बजट प्रभावित हो सकता है।

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nirmala sitharaman
(File Photo- PTI)

By Gaurav Kumar:

वेस्ट एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव की वजह से कच्चे तेल का दाम 100 डॉलर प्रति बैरल पार कर गए हैं। सरकार ने पिछले महीने ही अपने केंद्रीय बजट पेश किया था, हालांकि अब बढ़ती हुई तेल की कीमतों से सरकार का बजट प्रभावित हो सकता है।

वित्त मंत्री ने दिया आश्वासन

सोमवार को लोकसभा में बोलते हुए देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सभी को आश्वस्त किया है कि वेस्ट एशिया में चल रहे इस युद्ध का असर भारत पर ज्यादा नहीं होगा। भारत में महंगाई दर पहले से ही काफी कम है। उन्होंने कहा कि 28 फरवरी को शुरू हुए इस युद्ध से पहले तक कच्चे तेल की कीमतें और भारत द्वारा खरीदा गया तेल दोनों कम थे। हालांकि फरवरी 2026 और मार्च 2 के बीच कच्चे तेल की कीमत 69.01 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 80.16 डॉलर हो गई।

अक्टूबर 2025 में जारी हुई भारतीय रिजर्व बैंक की मौनेटरी पॉलिसी रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 10 प्रतिशत से बढ़ती हैं, तो इससे महंगाई दर 30 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकती है।

हालांकि दुनिया भर में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का मध्यम अवधि का असर क्या होगा, यह कई कारणों पर निर्भर करता है, जैसे उस समय का एक्सचेंज रेट, डिमांड और सप्लाई, मौनेटरी पॉलिसी ट्रांसमिशन और देश में महंगाई दर।

कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के अनुसार औसत खुदरा महंगाई 2023-24 में 5.4 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 4.6 प्रतिशत हो गई थी, जो 2025-26 में अप्रैल से जनवरी तक और कम होकर 1.8 प्रतिशत रह गई। जनवरी 2026 में महंगाई दर 2.75 प्रतिशत थी, जो कि RBI के इंफ्लेशन टॉलरेंस के 4% ± 2% के निचली सीमा के करीब है।

सूत्रों के मुताबिक सरकार को विश्वास है कि वेस्ट एशिया में हलचल ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहेगी और जल्द ही खत्म हो जाएगी। हालांकि इसके उलट अब इस युद्ध को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं कि अगर डॉलर के मुकाबले रुपया गिरता है और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो यह चिंता का कारण बन सकता है। अगर यह युद्ध एक महीने भी चलता है, तो तो इसका असर ट्रेड डेफिसिट, बैलेंस ऑफ पेमेंट, फिस्कल डेफिसिट, रिफ़ाइनरीज़ मिलने वाली सब्सिडी और कुछ हद तक महंगाई दर पर पड़ सकता है।

सप्लाई के साथ-साथ बढ़ी कीमतों ने बढ़ाई चिंता

सरकार ने पहले ही घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 60 रुपये की बढ़ोतरी की है। सोमवार को ही ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल पार कर गई, जो अभी लगभग 106 डॉलर प्रति बैरल पर है। इसके उलट, जब पिछले महीने केंद्रीय बजट पेश किया गया था, उस समय ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 69.32 डॉलर प्रति बैरल थी (30 जनवरी)।

एक जानकार ने बताया है कि भारत के लिए तेल की आपूर्ति के साथ-साथ इसकी कीमत भी काफी महत्वपूर्ण है। वेस्ट एशिया में युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में काफी उछाल आया है, रूस से मिलने वाला तेल भी अब प्रीमियम के साथ आ रहा है।

वित्त मंत्रालय के मासिक आर्थिक समीक्षा में साफ हुआ है कि भारत के पास पर्याप्त मात्रा में विदेशी मुद्रा भंडार है, साथ ही देश में महंगाई दर अपने निचले स्तर पर है। इन कारणों से भारत बढ़ती तेल कीमतों से मुकाबला कर सकता है।

युद्ध बढ़ने पर होगा नुकसान

हालांकि अगर यह युद्ध इसी तरह चलता रहा, तो इसका असर एक्सचेंज रेट और चालू खाता घाटे पर पड़ेगा, जिससे महंगाई में भी इजाफा हो सकता है।

आईसीआरए (ICRA) के मुताबिक अगर कच्चे तेल की एक बैरल की कीमत 10 डॉलर से बढ़ जाती है, तो इससे चालू खाता घाटा उस देश की सकल घरेलू उत्पाद के 0.3 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। भारत अपनी 85 प्रतिशत कच्ची तेल की जरूरत बाहर से आयात करता है। इसे लेकर चिंता यह है कि अगर आगे तेल की कीमतें कम नहीं हुईं, तो इसका भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

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