रिकॉर्ड गिरावट! 92 के स्तर तक फिसली भारतीय करेंसी - Details

ओपनिंग में रुपया डॉलर के मुकाबले 92 के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले हफ्ते बने 91.96 के रिकॉर्ड निचले स्तर से भी कमजोर है। आज की गिरावट के साथ ही इस साल अब तक रुपया करीब 2.25% टूट चुका है।

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By Gaurav Kumar:

भारतीय करेंसी 'रुपया' एक बार फिर रिकॉर्ड लो पर पहुंच गया है। गुरुवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 92 के स्तर तक फिसल गया। शेयर बाजार में कमजोर माहौल, डॉलर की बढ़ती मांग और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली के चलते रुपये पर दबाव आया।

ओपनिंग में रुपया डॉलर के मुकाबले 92 के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले हफ्ते बने 91.96 के रिकॉर्ड निचले स्तर से भी कमजोर है। आज की गिरावट के साथ ही इस साल अब तक रुपया करीब 2.25% टूट चुका है।

डॉलर इंडेक्स में मजबूती लौटने से भी रुपये को नुकसान हुआ। मंगलवार को करीब चार साल के निचले स्तर के पास पहुंचने के बाद डॉलर इंडेक्स में उछाल आया। यह मजबूती तब देखने को मिली जब अमेरिका के ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा कि अमेरिका मजबूत डॉलर की नीति पर कायम है और इसके लिए सही फंडामेंटल्स जरूरी हैं।

इससे पहले 28 जनवरी को रुपया डॉलर के मुकाबले 31 पैसे टूटकर 91.99 पर बंद हुआ था। महीने के अंत में डॉलर की बढ़ी हुई मांग के कारण यह रुपये का एक हफ्ते से भी कम समय में दूसरी बार सबसे निचला क्लोजिंग लेवल रहा।

रुपया क्यों हो रहा है कमजोर?

रुपये पर दबाव बने रहने के पीछे कई वजहें हैं। अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की भारी निकासी, सोने-चांदी जैसे बुलियन आयात में बढ़ोतरी और कंपनियों के बीच रुपये के और कमजोर होने की चिंता- इन सभी कारणों ने मिलकर रुपये को कमजोर किया है।

यह स्थिति तब है, जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है और हाल ही में भारत ने European Union के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट भी किया है। इसके बावजूद, अमेरिकी टैरिफ लागू होने के बाद से रुपया यूरो के मुकाबले 7.5% और चीनी युआन के मुकाबले भी 7.5% टूट चुका है।

केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, दिसंबर में ट्रेड-वेटेड आधार पर रुपये का रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट (REER) 95.3 रहा, जो पिछले 10 सालों का सबसे निचला स्तर है।

Goldman Sachs के एनालिस्ट्स ने Reuters से बातचीत में कहा कि भले ही भविष्य में भारतीय निर्यात पर लगे ऊंचे अमेरिकी टैरिफ कम हो जाएं, लेकिन इसमें हो रही देरी से भारत के एक्सटर्नल बैलेंस पर दबाव पड़ रहा है। उनका अनुमान है कि अगले 12 महीनों में रुपया और कमजोर होकर 94 प्रति डॉलर तक जा सकता है।

एनालिस्ट्स का यह भी कहना है कि Reserve Bank of India अब रुपये में ज्यादा उतार-चढ़ाव की अनुमति देने में पहले से ज्यादा सहज दिख रहा है। RBI डॉलर-रुपया दर नीचे आने पर विदेशी मुद्रा भंडार दोबारा बनाने की कोशिश कर सकता है, जिससे रुपये में तेज मजबूती पर रोक लग सकती है।

इसके अलावा, कंपनियों के हेजिंग व्यवहार में बदलाव ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। आयातक और विदेशी मुद्रा जोखिम वाली कंपनियां कमजोर रुपये से बचने के लिए ज्यादा हेजिंग कर रही हैं, जबकि निर्यातक फॉरवर्ड मार्केट में डॉलर बेचने की रफ्तार धीमी कर रहे हैं। इससे डॉलर की सप्लाई घटी है और रुपये पर दबाव और बढ़ गया है।

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