स्मार्टवॉच से लोगों का क्यों हो रहा है मोह भंग? चौंकाने वाली है वजह

भारत में स्मार्टवॉच की डिमांड तेजी से घट रही है। इनोवेशन की कमी, बजट घड़ियों की खराब क्वालिटी और मार्केट में ठहराव इसके मुख्य कारण हैं। अब ग्राहक सस्ती घड़ियों के बजाय टिकाऊ और प्रीमियम सेगमेंट को प्राथमिकता दे रहे हैं।

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By Gaurav Kumar:

Indian Smartwatch Market: पिछले कुछ सालों से भारतीय टेक बाजार में जिस स्मार्टवॉच का डंका बज रहा था, अब उसकी चमक धीरे-धीरे फीकी पड़ती नजर आ रही है। हालिया मार्केट रिसर्च रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में स्मार्टवॉच की सेल में भारी गिरावट दर्ज की गई है।

एक समय था जब हर दूसरे हाथ में स्मार्टवॉच नजर आती थी, लेकिन अब ग्राहकों का मोह इससे भंग होता दिख रहा है। आइए जानते हैं कि आखिर क्यों भारत का यह सबसे तेजी से बढ़ने वाला सेक्टर अब सुस्ती का शिकार हो गया है।

शिपमेंट में आई बड़ी गिरावट

मार्केट ट्रैकर आईडीसी (IDC) और काउंटरपॉइंट की ताजा रिपोर्ट बताती है कि साल 2025-26 के दौरान भारतीय स्मार्टवॉच बाजार के शिपमेंट में लगभग 20% से 25% तक की कमी आई है। यह पहली बार है जब इस सेक्टर ने इतनी बड़ी गिरावट देखी है।

जानकारों का कहना है कि मार्केट अब 'सैचुरेशन' यानी ठहराव के स्तर पर पहुंच गया है। इसका मतलब है कि जिन लोगों को स्मार्टवॉच की जरूरत थी, वे पहले ही इसे खरीद चुके हैं और अब नए खरीदारों की संख्या बाजार में काफी कम हो गई है।

क्यों गिरी डिमांड?

इनोवेशन की कमी और एक जैसे फीचर्स- बाजार में गिरावट की एक बड़ी वजह इनोवेशन का अभाव है। 2,000 से 4,000 रुपये के बजट सेगमेंट में मिलने वाली ज्यादातर घड़ियों में लगभग एक जैसे फीचर्स होते हैं, जैसे- स्टेप काउंटर, हार्ट रेट मॉनिटर और कॉल नोटिफिकेशन। ग्राहकों को अपनी पुरानी घड़ी बदलकर नई घड़ी खरीदने का कोई ठोस कारण नहीं मिल रहा है। 

क्वालिटी और सटीकता पर उठते सवाल- शुरुआती दौर में लोगों ने फैशन और शौक के लिए सस्ती स्मार्टवॉच खरीदीं, लेकिन अब वे इनके द्वारा दिए जाने वाले हेल्थ डेटा की सटीकता (Accuracy) को लेकर सजग हो गए हैं। कई रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई है कि बजट सेगमेंट की घड़ियां हमेशा सही मेडिकल डेटा नहीं देतीं। ऐसे में लोग अब सिर्फ दिखावे के लिए घड़ी पहनने के बजाय सटीक जानकारी देने वाले प्रीमियम ब्रांड्स की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे मास-मार्केट सेगमेंट (सस्ती घड़ियों) की सेल काफी गिर गई है।

प्रीमियम सेगमेंट की ओर बढ़ता झुकाव- भले ही कुल बिक्री कम हुई है, लेकिन एक दिलचस्प ट्रेंड यह देखने को मिला है कि 15,000 रुपये से ऊपर की प्रीमियम घड़ियों की मांग बढ़ी है। अब भारतीय ग्राहक 'सस्ते' के बजाय 'क्वालिटी' को तवज्जो दे रहे हैं।

एप्पल, सैमसंग जैसे ब्रांड्स के बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने से लोकल बजट ब्रांड्स जैसे नॉइज़ (Noise) और बोट (boAt) के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।
 

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