युद्ध यूएस-इजरायल का ईरान के साथ लेकिन कीमत चुकाई भारतीय निवेशकों ने! मार्केट से दो हफ्तों में ₹23 लाख करोड़ साफ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान युद्ध को जल्द खत्म करने का वादा किया है, लेकिन मौजूदा हालात ने पहले से दबाव झेल रहे बाजार निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले करीब 21 महीनों से बाजार में ठोस रिटर्न नहीं मिलने से भी निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है।

In Short
- पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच दो हफ्तों में भारतीय निवेशकों की करीब 23 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति घट गई।
- भारतीय शेयर बाजार का कुल मार्केट कैप 463.51 लाख करोड़ रुपये से घटकर 440.84 लाख करोड़ रुपये रह गया।
- विशेषज्ञों के मुताबिक ऊंची तेल कीमतें, महंगाई का जोखिम और वैश्विक अनिश्चितता बाजार पर दबाव बढ़ा सकते हैं।
भारत के शेयर बाजार निवेशकों को पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। पड़ोस में छिड़े इस संघर्ष को अभी दो हफ्ते भी नहीं हुए हैं, लेकिन इस दौरान निवेशकों की संपत्ति करीब 23 लाख करोड़ रुपये घट चुकी है। डॉलर के हिसाब से यह गिरावट लगभग 250 अरब डॉलर के बराबर बैठती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान युद्ध को जल्द खत्म करने का वादा किया है, लेकिन मौजूदा हालात ने पहले से दबाव झेल रहे बाजार निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले करीब 21 महीनों से बाजार में ठोस रिटर्न नहीं मिलने से भी निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है।
मार्केट कैप में बड़ी गिरावट
अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले 28 फरवरी को शुरू हुए थे, जिसके बाद से संघर्ष खाड़ी देशों और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज तक फैल गया। इससे वैश्विक बाजारों पर दबाव बढ़ा और ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता गहरा गई।
इन घटनाओं के असर से भारतीय बाजार का कुल मार्केट कैप 27 फरवरी के 463.51 लाख करोड़ रुपये से घटकर गुरुवार को 440.84 लाख करोड़ रुपये रह गया। यानी कुल मिलाकर 22.65 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति बाजार से मिट गई। इसी दौरान NSE निफ्टी और BSE सेंसेक्स भी लगभग उसी स्तर के आसपास ट्रेड कर रहे हैं, जहां वे जून 2023 में था।
कई सेक्टरों पर असर
एक्सपर्ट के मुताबिक पश्चिम एशिया संकट का असर कम से कम 10 सेक्टरों पर दिखने लगा है और आने वाली तिमाहियों के कॉर्पोरेट नतीजों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
YES सिक्योरिटीज के हितेश जैन का कहना है कि संघर्ष की आर्थिक कीमत इस बात पर निर्भर करेगी कि यह कितने समय तक चलता है और इसकी तीव्रता कितनी रहती है।
उन्होंने कहा कि अगर संघर्ष लंबा चलता है तो ऊर्जा कीमतें ऊंची रह सकती हैं, महंगाई का जोखिम बढ़ेगा, उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव पड़ेगा और ग्लोबल जोखिम लेने की क्षमता घट सकती है। भारत के लिए महंगा ऊर्जा आयात और कमजोर पूंजी प्रवाह मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता और इक्विटी बाजारों पर दबाव डाल सकता है।
तेल और निफ्टी का संबंध
ICICI सिक्योरिटीज के अनुसार इतिहास में कच्चे तेल की कीमत और निफ्टी के प्रदर्शन के बीच एक खास पैटर्न दिखा है।
जब तेल की कीमत 90-100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहती है, तब यह ग्लोबल मांग का संकेत देती है और बाजार पर पॉजिटिव असर पड़ सकता है। लेकिन जब कीमतें 100 डॉलर से ऊपर जाती हैं, तब यह भारत के आयात बिल पर दबाव डालती हैं और सप्लाई शॉक का संकेत देती हैं, जिससे बाजार पर नकारात्मक असर पड़ता है।
लंबा खिंच सकता है संघर्ष
एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह संघर्ष रणनीतिक प्रकृति का है और जल्दी खत्म होना मुश्किल हो सकता है। YES सिक्योरिटीज के हितेश जैन के मुताबिक ईरान के लिए यह लड़ाई सैन्य जीत से ज्यादा शासन के अस्तित्व से जुड़ी है, इसलिए तनाव कम होने की संभावना सीमित है।
उन्होंने यह भी कहा कि चीन और रूस जैसे देश ईरान की निर्णायक हार नहीं चाहते क्योंकि इससे अमेरिका का प्रभाव उनके रणनीतिक क्षेत्रों में बढ़ सकता है।
निवेशकों के लिए रणनीति
टाटा एसेट मैनेजमेंट के CIO राहुल सिंह का कहना है कि हालिया गिरावट के बाद निफ्टी का वैल्यूएशन अब अपेक्षाकृत संतुलित दिख रहा है और यह करीब 20 गुना आय (PE) के आसपास ट्रेड कर रहा है।
उनके मुताबिक निकट अवधि में वैश्विक घटनाओं से बाजार का मूड प्रभावित रह सकता है, लेकिन कंज्यूमर और फार्मा सेक्टर अपेक्षाकृत सुरक्षित रह सकते हैं। वहीं मेटल और एनर्जी सेक्टर को ऊंची कमोडिटी कीमतों से फायदा मिल सकता है।
ब्रोकरेज फिलिपकैपिटल का कहना है कि मौजूदा माहौल में चर्निंग और गिरावट पर खरीदारी (buy-on-dips) की रणनीति निवेशकों के लिए बेहतर अल्फा बना सकती है।