सोने की कीमतों में तेजी के बीच क्या सरकार दोबारा लाएगी सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड? बजट से पहले इस प्रस्ताव पर चर्चा तेज

ऐसे समय में जब सोने के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई के करीब हैं और अलग-अलग एसेट क्लास में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, कई निवेशक मानते हैं कि SGBs को फिर शुरू करना गोल्ड में निवेश का पारदर्शी और टैक्स-एफिशिएंट रास्ता खोल सकता है।

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By Gaurav Kumar:

केंद्रीय बजट से पहले वित्त मंत्रालय के सामने टैक्स और नीतिगत सुझावों की लंबी लिस्ट है। इसी बीच एक प्रस्ताव पर फिर से चर्चा तेज हो गई है- सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) की वापसी।

ऐसे समय में जब सोने के दाम रिकॉर्ड ऊंचाई के करीब हैं और अलग-अलग एसेट क्लास में उतार-चढ़ाव बना हुआ है, कई निवेशक मानते हैं कि SGBs को फिर शुरू करना गोल्ड में निवेश का पारदर्शी और टैक्स-एफिशिएंट रास्ता खोल सकता है।

क्यों लोकप्रिय थे SGB?

जब SGB जारी हो रहे थे, तब यह गोल्ड में निवेश का पसंदीदा विकल्प बनकर उभरे। सरकार की गारंटी के चलते स्टोरेज, शुद्धता और बीमा जैसी फिजिकल गोल्ड की दिक्कतें खत्म हो जाती थीं।

निवेशकों को सालाना 2.5% फिक्स्ड ब्याज मिलता था और सोने के दाम बढ़ने का फायदा अलग। सबसे बड़ी बात- मैच्योरिटी पर रिडेम्पशन पर कैपिटल गेन टैक्स नहीं लगता था, जिसने इसे लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए खास बनाया।

अभी क्यों बंद हैं नए ट्रांच?

फिलहाल कोई नया SGB ट्रांच उपलब्ध नहीं है। यह योजना 2024 की शुरुआत में रोक दी गई थी और 2025 के अंत व 2026 की शुरुआत तक भी बंद ही है। आखिरी ट्रांच SGB 2023-24 Series IV फरवरी 2024 में आई थी। मौजूदा बॉन्ड्स पर ब्याज जारी है और तय शर्तों पर रिडीम होंगे, लेकिन नए निवेश का विकल्प फिलहाल नहीं है।

अक्षा कंबोज, वाइस प्रेसिडेंट, India Bullion & Jewellers Association और एग्जीक्यूटिव चेयरपर्सन, Aspect Global Ventures का मानना है कि SGB आज भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। उनका कहना है कि रिकॉर्ड गोल्ड प्राइस और बाजार की अस्थिरता के दौर में संरचित निवेश साधनों पर दोबारा विचार जरूरी है। उनके मुताबिक, SGBs ने गोल्ड के फाइनेंशियलाइजेशन में योगदान दिया और फिजिकल गोल्ड इंपोर्ट घटाने में मदद की, हालांकि किसी भी री-लॉन्च में साफ और प्रभावी एग्ज़िट मैकेनिज़्म जरूरी होगा।

दूसरी ओर, Stable Money के को-फाउंडर और CEO सौरभ जैन का कहना है कि निवेशकों का रुझान तेजी से गोल्ड ETF और SIP की ओर बढ़ रहा है। उनके मुताबिक, ऊंचे दामों पर SGB सरकार के लिए फिस्कली महंगे साबित हो सकते हैं, जबकि SEBI-रेगुलेटेड ETF निवेशकों को लिक्विडिटी और सुविधा देते हैं।

सरकार का रुख

सरकार पहले ही लागत को लेकर चिंता जता चुकी है। 2025 के मॉनसून सत्र में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद को बताया था कि 2015 में शुरू हुई SGB योजना के तहत 67 ट्रांच में करीब 146.96 टन सोने के बराबर सब्सक्रिप्शन जुटाया गया, जिसकी कीमत 72,275 करोड़ रुपये रही। बढ़ते वैश्विक तनाव और सोने की कीमतों में उछाल से SGB के जरिए उधारी महंगी हो गई है, इसलिए नए ट्रांच पर फैसला बाजार हालात देखकर होगा।

टैक्स और मैच्योरिटी

SGB की मैच्योरिटी 8 साल की होती है, पांचवें साल से प्रीमैच्योर रिडेम्पशन का विकल्प मिलता है। मैच्योरिटी पर कैपिटल गेन टैक्स फ्री है, TDS नहीं लगता और बॉन्ड डिजिटल फॉर्म में होते हैं। इन्हें एक्सचेंज पर ट्रेड भी किया जा सकता है और लोन के लिए गिरवी रखा जा सकता है।

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