म्यूचुअल फंड में सिर्फ 3-6 महीने के लिए निवेश करना है और अच्छा रिटर्न भी चाहिए? ये ऑप्शन हो सकता है बेस्ट

आज हम आपको एक ऐसे म्यूचुअल फंड टाइप के बारे में बताएंगे जो उन निवेशकों के लिए अच्छा ऑप्शन है जिन्हें सिर्फ 3 से 6 महीने के लिए निवेश करना है। इन फंड्स को अल्ट्रा शॉर्ट टर्म म्यूचुअल फंड कहा जाता है। 

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By Gaurav Kumar:

Ultra Short Term Mutual Fund: ज्यादातर लोगों को यही लगता है कि म्यूचुअल फंड में लॉन्ग टर्म के लिए निवेशक करना ही बेहतर होता है। हालांकि यह सच है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि शॉर्ट टर्म के लिए म्यूचुअल फंड खराब है। 

आज हम आपको एक ऐसे म्यूचुअल फंड टाइप के बारे में बताएंगे जो उन निवेशकों के लिए अच्छा ऑप्शन है जिन्हें सिर्फ 3 से 6 महीने के लिए निवेश करना है। इन फंड्स को अल्ट्रा शॉर्ट टर्म म्यूचुअल फंड कहा जाता है। 

क्या है अल्ट्रा शॉर्ट टर्म म्यूचुअल फंड?

अल्ट्रा शॉर्ट टर्म म्यूचुअल फंड स्कीम डेट फंड की एक कैटेगरी है, जो 3 से 6 महीने की मैच्योरिटी वाले फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करती है। यह स्कीम उन निवेशकों के लिए अच्छा ऑप्शन है, जो कम अवधि में लिक्विडिटी और ओवरनाइट या लिक्विड फंड से थोड़ा बेहतर रिटर्न चाहते हैं।

कैसे काम करती है यह स्कीम?

यह स्कीम मुख्य रूप से डेब्ट और मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश करती है, जिनकी ड्यूरेशन तीन से छह महीने के बीच रहती है। फंड मैनेजर पोर्टफोलियो को एक्टिव रूप से मैनेज करते हैं और कमर्शियल पेपर, ट्रेजरी बिल, सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट और शॉर्ट-ड्यूरेशन कॉरपोरेट बॉन्ड जैसे साधनों में निवेश करते हैं।

कम अवधि के कारण इन स्कीम्स में लंबी अवधि वाले डेट फंड की तुलना में उतार-चढ़ाव कम रहता है। यही वजह है कि इन्हें लिक्विड फंड से एक कदम ऊपर लेकिन जोखिम के मामले में उनके तुलना में सुरक्षित माना जाता है।

क्या हैं फायदे?

अल्ट्रा शॉर्ट टर्म स्कीम ब्याज दरों में बदलाव से कम प्रभावित होती हैं, क्योंकि इनकी मैच्योरिटी अवधि छोटी होती है। निवेशक आसानी से पैसा निकाल सकते हैं, इसलिए लिक्विडिटी भी बनी रहती है। साथ ही, लंबी अवधि के डेट फंड की तुलना में इनका रिस्क प्रोफाइल कम रहता है।

किन जोखिमों का रखें ध्यान?

हालांकि जोखिम ओवरनाइट या लिक्विड फंड से कम है, लेकिन क्रेडिट रिस्क पूरी तरह खत्म नहीं होता। कुछ स्कीम्स में कम रेटिंग वाले कॉरपोरेट बॉन्ड का एक्सपोजर हो सकता है।

बॉन्ड मार्केट में उतार-चढ़ाव से नेट एसेट वैल्यू (NAV) पर हल्का असर पड़ सकता है। इसके अलावा, जल्दी-जल्दी निवेश मैच्योर होने के कारण फंड मैनेजर को दोबारा निवेश करना पड़ता है। अगर उस समय ब्याज दरें गिरती हैं, तो रिटर्न प्रभावित हो सकता है।

किन निवेशकों के लिए सही?

तीन से छह महीने के निवेश टारगेट वाले और स्थिरता पसंद करने वाले कंजर्वेटिव निवेशकों के लिए यह स्कीम अच्छी मानी जाती है। इसके अलावा ऐसे लोग जो सीमित जोखिम के साथ शॉर्ट टर्म में बेहतर यील्ड चाहते हैं उनके लिए भी यह ऑप्शन अच्छा हो सकता है। 

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