Inheritance Tax: भारत में पहले लगता था विरासत टैक्स, जानिए इस अजीब टैक्स की ग़जब कहानी

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की जीत के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। उसी वर्ष, तत्कालीन वित्त राज्य मंत्री, जयंत सिन्हा ने सार्वजनिक रूप से विरासत कर की शुरूआत की वकालत की थी। सिन्हा ने कहा था कि इस तरह के कर से वंशवादी व्यवसायियों को मिलने वाले कुछ फायदे खत्म हो जाएंगे और खेल का मैदान बराबर करने में मदद मिलेगी।

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सैम पित्रोदा ने "अमेरिका जैसा विरासत कर" की वकालत की तो बीजेपी हमलावर हो गई
सैम पित्रोदा ने "अमेरिका जैसा विरासत कर" की वकालत की तो बीजेपी हमलावर हो गई

By BT बाज़ार डेस्क:

Sam Pitroda ने "अमेरिका जैसा विरासत कर" की वकालत की तो बीजेपी हमलावर हो गई। लेकिन क्या आपको मालूम है कि भारत में पहले भी अमेरिका जैसा विरासत कर लगता था। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने पित्रोदा के बयान पर सफाई देते हुए ट्वीट किया, "कांग्रेस की विरासत कर यानि इनहेरिटेंस टैक्स लगाने की कोई योजना नहीं है। हकीकत यह है कि राजीव गांधी ने 1985 में संपत्ति शुल्क समाप्त कर दिया था।" लेकिन भारत में विरासत कर की अवधारणा नई नहीं है। साल 1985 में खत्म किए जाने से पहले यह लगभग चार दशक तक भारत में बहुत प्रचलित था। तब से, इस तरह के कर को वापस लाने का विचार पूर्ववर्ती कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार और बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार दोनों ने किया था। पूर्व वित्त मंत्री पी.चिदंबरम ने 2011-2013 के बीच कई मौकों पर सरकारी संसाधनों को बढ़ाने के लिए विरासत कर लगाने का उल्लेख किया। इसी तरह, एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान, पूर्व वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा इस विचार के प्रबल समर्थक थे। दरअसल आजादी के तुरंत बाद 1953 में इस कर को लगाया गया था। उस समय संपत्ति में भारी असमानताएं थी।

1953-85 के बीच विरासत कर कैसे लगाया गया?

आर्थिक असमानता को कम करने के लिए संपत्ति शुल्क अधिनियम के तहत 1953 में विरासत कर पेश किया गया था। हालांकि सरकार ने जब इसको लागू किया था उस समय ये 85% तक लगता है। उस समय भी इसका भारी विरोध हुआ था।

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विरासत कर क्यों समाप्त किया गया?

यह कानून देश के राजस्व को बढ़ाने और गंभीर आर्थिक असमानता को कम करने के लिए लाया गया था, लेकिन इसके लागू होने के 30 वर्षों के दौरान विपक्ष के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों ने भी इसकी तीखी आलोचना की। ऐसे कई कारक थे जिनके कारण अंततः 1985 में तत्कालीन वित्त मंत्री वीपी सिंह द्वारा कर को समाप्त कर दिया गया। कानून में विभिन्न प्रकार की संपत्ति का मूल्यांकन करने के लिए अलग-अलग नियम थे, जिससे यह एक जटिल कानून बन गया। द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1984-85 में एस्टेट ड्यूटी एक्ट के तहत कुल 20 करोड़ रुपये का टैक्स इकट्ठा हुआ था। हालांकि, कलेक्शन की लागत बहुत अधिक थी। कलेक्शन कम होता रहा क्योंकि लोगों ने कर का भुगतान करने से बचने के तरीके खोजने शुरू कर दिए। विरासत में मिली संपत्तियों को अवैध रूप से छिपाने के अलावा, बेनामी संपत्तियों को रखने की प्रथा ने भी जोर पकड़ लिया इसके अलावा, आयकर के ऊपर एक अलग संपत्ति कर को दोहरे कराधान के रूप में देखा गया, जिससे लोगों के बीच नाराजगी पैदा हुई। लेकिन बार-बार सरकारें इस पर विचार करती रही हैं। इस तरह के कर को फिर से लगाने का विचार पहली बार गृह मंत्री पी चिदंबरम ने 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह  अध्यक्षता में योजना आयोग (अब नीति आयोग) की बैठक के दौरान किया था। यूपीए-1 सरकार के पहले चार वर्षों के दौरान चिदंबरम वित्त मंत्री थे।

जब जेटली और जयंत सिन्हा ने किया था विरासत कर का समर्थन

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार की जीत के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला गया। उसी वर्ष, तत्कालीन वित्त राज्य मंत्री, जयंत सिन्हा ने सार्वजनिक रूप से विरासत कर की शुरूआत की वकालत की थी। सिन्हा ने कहा था कि इस तरह के कर से वंशवादी व्यवसायियों को मिलने वाले कुछ फायदे खत्म हो जाएंगे और खेल का मैदान बराबर करने में मदद मिलेगी। 2017 में ऐसी खबरें आई थीं कि सरकार इनहेरिटेंस टैक्स दोबारा लागू करने जा रही है। 2018 में भी, तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसकी वकालत करते हुए कहा था कि विकसित देशों में अस्पतालों और विश्वविद्यालयों को विरासत कर जैसे कारकों के कारण बड़ा अनुदान मिलता है।

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