आसमान में भारत का परचम: निजी अंतरिक्ष स्टार्टअप्स ला रहे हैं निवेश की बहार और रोजगार के अनगिनत अवसर?

भारत का निजी अंतरिक्ष उद्योग तेजी से आगे बढ़ रहा है। स्काईरूट एयरोस्पेस की सफलता और देश में 450 स्पेस स्टार्टअप की मौजूदगी नई संभावनाएं दिखाती है। लेकिन दूसरी ओर, बेरोजगारी, कंपनियों की सुस्त भर्ती और निवेश को लेकर चिंता बनी हुई है। आखिर भारत की तरक्की की राह में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

Advertisement

By Siddharth Zarabi:

संपादकीय-  सिद्धार्थ ज़राबी, ग्रुप एडिटर, बिजनेस टुडे

हजारों वर्षों से भारतीयों की नजरें आसमान पर टिकी रही हैं। वे तारों और ग्रहों की चाल का अध्ययन करते आए हैं। ज्योतिष के जरिए भविष्य में क्या होने वाला है, इसका अनुमान लगाने की कोशिश करते रहे हैं।

लेकिन आज भारतीयों की एक नई पीढ़ी बिल्कुल अलग सोच और महत्वाकांक्षा के साथ आसमान की ओर देख रही है। अब उसका मकसद भविष्य का अनुमान लगाना नहीं, बल्कि अंतरिक्ष की अनंत संभावनाओं को तलाशना और वहां अपनी पहचान बनाना है।

जुलाई में श्रीहरिकोटा से स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) के विक्रम-1 (Vikram-1) रॉकेट का सफल प्रक्षेपण भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि रहा। स्काईरूट देश की पहली स्पेस-टेक यूनिकॉर्न कंपनी है। पूरी तरह कार्बन-कंपोजिट स्ट्रक्चर से तैयार चार फेज वाला यह रॉकेट जब आसमान की ओर बढ़ा, तो अपने साथ नई पीढ़ी के उद्यमियों की महत्वाकांक्षाओं, आत्मविश्वास और कुछ कर गुजरने के जज्बे को भी नई ऊंचाई पर ले गया।

यह उपलब्धि अचानक हासिल नहीं हुई है। इसके पीछे अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक में छह दशकों का सरकारी निवेश है। साथ ही, 2020 से शुरू हुए व्यापक सुधारों ने इस क्षेत्र के दरवाजे निजी कंपनियों के लिए खोल दिए। इन बदलावों के नतीजे अब सामने आने लगे हैं। भारत में आज करीब 450 स्पेस स्टार्टअप हैं, जो रॉकेट और सैटेलाइट से लेकर अत्याधुनिक प्रोपल्शन सिस्टम और अंतरिक्ष आधारित सेवाओं तक कई क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।

हालांकि, ये उपलब्धियां अभी सिर्फ शुरुआत हैं। असली चुनौती इन शुरुआती सफलताओं को लंबे समय तक टिकने वाले और मुनाफा कमाने वाले कारोबार में बदलने की है। इस अंक की दो हिस्सों वाली कवर स्टोरी में प्रदीप के. साहा ने इसी महत्वपूर्ण पहलू का विस्तार से विश्लेषण किया है।

इस बीच, बिजनेस टुडे की पत्रकार सुरभि ने देश में रोजगार की लगातार गंभीर होती चुनौती की पड़ताल की है। दुखद सच्चाई यह है कि भारत के बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे युवाओं को आज भी स्थायी और सम्मानजनक वेतन वाली नौकरी पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। कॉलेज से निकलने वाले नए स्नातकों की शिकायत है कि शुरुआती स्तर की नौकरियां बहुत कम हैं। जहां नौकरियां मिल भी रही हैं, वहां वेतन इतना कम है कि रोजमर्रा के खर्च पूरे करना मुश्किल हो जाता है।

दूसरी ओर, कंपनियों में भर्ती करने वाले लोगों का कहना है कि उन्हें जरूरत के मुताबिक कुशल कर्मचारी नहीं मिल रहे। ऐसे में हैरानी नहीं होनी चाहिए कि सरकारी नौकरी का आकर्षण आज भी बरकरार है। खासकर तब, जब शुरुआती स्तर की सरकारी नौकरियों में निजी क्षेत्र के मुकाबले ज्यादा वेतन मिलता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में तेजी से हो रही प्रगति और अमेरिका में H-1B वीजा पर लगातार बढ़ती सख्ती इस चुनौती को और जटिल बना रही है।

इन परिस्थितियों में एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या भारतीय कंपनियां निवेश बढ़ाने और नई नौकरियां देने के लिए तैयार हैं? अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के लिए बिजनेस टुडे-C Fore बिजनेस कॉन्फिडेंस इंडेक्स के नतीजे इस मोर्चे पर ज्यादा भरोसा नहीं जगाते। सर्वे में शामिल 500 शीर्ष कॉरपोरेट अधिकारियों में से केवल 11% ने त्योहारों के दौरान नई भर्तियां करने की योजना जताई, जबकि महज 6% ने पूंजीगत खर्च बढ़ाने की इच्छा दिखाई।

यहां एक महत्वपूर्ण बात ध्यान देने वाली है। यह सर्वे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा करीब चार साल में पहली बार ब्याज दरें बढ़ाए जाने से पहले किया गया था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भारतीय शेयर बाजार और रुपये, दोनों पर दबाव बढ़ाया है।

विदेशों से डॉलर का अभूतपूर्व प्रवाह और केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप के बावजूद भारतीय रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तरों के आसपास बना हुआ है। वहीं, महज चार सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 51 अरब डॉलर घट चुका है।

अब जबकि हम त्योहारों के मौसम में प्रवेश कर रहे हैं, उपभोक्ता खर्च में तेजी आने की उम्मीद है। लेकिन बढ़ती महंगाई और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ने का खतरा अब भी बना हुआ है। यही अनिश्चितताएं निवेश और रोजगार की संभावनाओं पर भी असर डाल रही हैं।

भारत के उद्यमी आज सितारों तक पहुंचने का सपना देख रहे हैं। वे नई तकनीक, नए विचारों और अपने आत्मविश्वास के दम पर संभावनाओं की नई दुनिया तैयार कर रहे हैं। लेकिन इन महत्वाकांक्षाओं को वास्तविक सफलता में बदलने के लिए जरूरी है कि नीतियां बनाने वाले भी अपनी भूमिका निभाएं और ऐसा माहौल तैयार करें, जिसमें हमारे उद्यमी और ऊंची उड़ान भर सकें।

Read more!
Advertisement