Budget 2026: क्या मिडिल क्लास को मिलेगी टैक्स में बड़ी राहत? एक्सपर्ट को है ये उम्मीदें - Details
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट 2026 में टैक्स-फ्री स्लैब बढ़ाने, स्टैंडर्ड डिडक्शन में इजाफा करने और टैक्स स्लैब के रेशनलाइजेशन जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। इसके साथ ही, डिजिटल ट्रैकिंग और संरचनात्मक सुधारों के जरिए टैक्स नेट को विस्तार देने और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में भी अहम ऐलान होने की उम्मीद है।

Union Budget 2026: 1 फरवरी को पेश होने वाले केंद्रीय बजट से पहले टैक्स व्यवस्था में बदलाव को लेकर उम्मीदें तेज हो गई हैं। खासतौर पर सैलरी पाने वाले मिडिल क्लास को राहत देने, टैक्स सिस्टम को सरल बनाने और अनुपालन का बोझ कम करने पर जोर देने की मांग उठ रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट 2026 में टैक्स-फ्री स्लैब बढ़ाने, स्टैंडर्ड डिडक्शन में इजाफा करने और टैक्स स्लैब के रेशनलाइजेशन जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। इसके साथ ही, डिजिटल ट्रैकिंग और संरचनात्मक सुधारों के जरिए टैक्स नेट को विस्तार देने और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में भी अहम ऐलान होने की उम्मीद है।
आईएमआई दिल्ली में फाइनेंस और अकाउंटिंग की एसोसिएट प्रोफेसर शिखा भाटिया के अनुसार, आने वाले बजट में सैलरी पाने वाले मिडिल क्लास को कुछ राहत दी जानी चाहिए, ताकि घरेलू टैक्स बोझ कम हो और लोगों की डिस्पोजेबल इनकम बढ़ सके, साथ ही वित्तीय अनुशासन भी बना रहे। उन्होंने उम्मीद जताई कि टैक्स-फ्री स्लैब को और बढ़ाया जाए और स्टैंडर्ड डिडक्शन को 1 लाख रुपये तक किया जाए। इसके अलावा, टीडीएस और टीसीएस से जुड़े नियमों को सरल बनाना जरूरी है। साथ ही, इनकम टैक्स रिटर्न की प्रोसेसिंग को तेज करने और रिफंड जल्दी मिलने की व्यवस्था भी बजट में शामिल की जानी चाहिए।
आईएमआई दिल्ली में फाइनेंस और अकाउंटिंग के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रतीक बेदी के मुताबिक बजट 2026 में टैक्स स्लैब के रेशनलाइजेशन पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि टैक्स सिस्टम को ज्यादा सरल और प्रोग्रेसिव बनाने के लिए महंगाई के अनुरूप मार्जिनल टैक्स रेट्स में बदलाव, सबसे ऊंचे टैक्स स्लैब की सीमा को धीरे-धीरे बढ़ाना और पुराने व जटिल प्रावधानों को मिलाकर एक पारदर्शी टैक्स कोड तैयार करना जरूरी है, जिससे करदाताओं पर अनुपालन का बोझ कम हो।
इसके अलावा, उन्होंने टैक्स ढांचे में संरचनात्मक सुधारों की जरूरत पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, पैन-आधार लिंक के जरिए जीएसटी ट्रैकिंग को मजबूत करना, डिजिटल रसीदों को बढ़ावा देना और रियल-टाइम रिपोर्टिंग को बेहतर बनाकर टैक्स नेट को स्वाभाविक रूप से बढ़ाया जा सकता है। साथ ही, जीएसटी, कॉरपोरेट फाइलिंग और वित्तीय लेन-देन जैसे अलग-अलग डेटाबेस को एकीकृत कर आधुनिक रिस्क-आधारित असेसमेंट अपनाने से अघोषित आय और हाई-नेट-वर्थ टैक्सपेयर्स की बेहतर पहचान हो सकेगी।