Flex-Fuel क्या होता है, माइलेज पर कितना असर पड़ेगा और क्या सच में पेट्रोल के मुकाबले आपका पैसा बचेगा?
सरकार और ऑटो इंडस्ट्री इसे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं। जानिए Flex-Fuel से जुड़े मन में उठ रहे सवालों के जवाब

भारत में क्लीन मोबिलिटी की दिशा में एक नया दौर शुरू हो गया है। देश की सबसे बड़ी टू-व्हीलर कंपनी ने बीते मंगलवार को दो नई फ्लेक्स-फ्यूल मोटरसाइकिल लॉन्च की हैं। कंपनी ने Hero Splendor Plus Flex-Fuel को 82,710 रुपये (एक्स-शोरूम, दिल्ली) और Hero HF Deluxe Flex-Fuel को 72,792 रुपये में पेश किया है।
ये बाइक E20 से लेकर E85 तक के एथेनॉल ब्लेंड पर चल सकती हैं। कंपनी जुलाई 2026 से इन बाइक्स की बिक्री दिल्ली और महाराष्ट्र के कुछ चुनिंदा इलाकों में शुरू करेगी, जिसके बाद इन्हें पूरे देश में लॉन्च किया जाएगा।
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सरकार और ऑटो इंडस्ट्री इसे आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने की दिशा में बड़ा कदम मान रहे हैं।
क्या होते हैं Flex-Fuel वाहन?
Flex-Fuel Vehicle (FFV) ऐसे इंटरनल कंबशन इंजन से लैस होते हैं जो पेट्रोल, एथेनॉल या दोनों के किसी भी मिश्रण पर चल सकते हैं। ये वाहन E20 ही नहीं बल्कि E85 और यहां तक कि E100 यानी 100% एथेनॉल तक इस्तेमाल कर सकते हैं।
इन वाहनों की खासियत यह है कि इनमें लगे सेंसर टैंक में मौजूद एथेनॉल की मात्रा पहचान लेते हैं और उसी हिसाब से इंजन सेटिंग बदल जाती है।
माइलेज पर कितना असर?
एथेनॉल पेट्रोल के मुकाबले ज्यादा साफ तरीके से जलता है, लेकिन इससे निकलने वाली ऊर्जा पेट्रोल से कम होती है। इसी वजह से फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां समान दूरी तय करने के लिए पेट्रोल वाहनों की तुलना में ज्यादा ईंधन इस्तेमाल करती हैं, यानी इनका माइलेज कम हो सकता है।
हालांकि एथेनॉल आधारित फ्यूल आमतौर पर सस्ता होता है, जिससे बढ़ी हुई खपत का असर कुछ हद तक बैलेंस हो जाता है। कम माइलेज के बावजूद कम फ्यूल कॉस्ट के कारण फ्लेक्स-फ्यूल वाहन भारत में लोगों के लिए एक किफायती और बेहतर विकल्प माने जा रहे हैं।
सामान्य पेट्रोल गाड़ियों से कैसे अलग?
भारत में अभी ज्यादातर पेट्रोल वाहन E20 ब्लेंड तक के लिए तैयार हैं। लेकिन ज्यादा एथेनॉल इस्तेमाल करने पर सामान्य इंजन में जंग, फ्यूल सिस्टम खराब होने और परफॉर्मेंस गिरने जैसी दिक्कतें आ सकती हैं।
Flex-Fuel वाहनों में खास तरह के पार्ट्स लगाए जाते हैं, जिनमें एथेनॉल-रेजिस्टेंट फ्यूल टैंक, मॉडिफाइड फ्यूल इंजेक्टर, स्पेशल ECU और सेंसर शामिल हैं। पूरे फ्यूल सिस्टम में ऐसे मटेरियल का इस्तेमाल होता है जो एथेनॉल के असर को सह सकें।
क्या पैसे बचाने में मिलेगी मदद?
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की लागत और बचत काफी हद तक एथेनॉल की कीमतों पर निर्भर करती है। आमतौर पर एथेनॉल को पेट्रोल की तुलना में सस्ता बनाया जा सकता है।
हालांकि इसमें एक नुकसान भी है। एथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले करीब 30-35 फीसदी कम ऊर्जा होती है, इसलिए E100 जैसे हाई एथेनॉल फ्यूल पर वाहन को समान दूरी तय करने के लिए ज्यादा ईंधन की जरूरत पड़ती है। यानी माइलेज कम हो सकता है।
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ऐसे में कुल बचत इस बात पर निर्भर करेगी कि एथेनॉल और पेट्रोल की कीमतों में कितना अंतर है, सरकार की टैक्स नीति क्या है और वाहन कितना फ्यूल एफिशिएंट है।
कैसे काम करती है ये तकनीक?
एथेनॉल पेट्रोल से अलग तरीके से जलता है और इसमें ऑक्सीजन मौजूद होती है। इसकी ऑक्टेन रेटिंग ज्यादा होने से इंजन नॉकिंग कम होती है। हालांकि, एथेनॉल में पेट्रोल के मुकाबले प्रति लीटर कम ऊर्जा होती है।
इसी वजह से FFV लगातार फ्यूल इंजेक्शन टाइमिंग, एयर-फ्यूल रेशियो और इग्निशन टाइमिंग को एडजस्ट करते रहते हैं ताकि वाहन किसी भी मिश्रण पर सही तरीके से चल सके।
सरकार एथेनॉल को क्यों बढ़ावा दे रही?
एथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने, मक्का और कृषि अवशेषों से तैयार होता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है, जिससे वैश्विक तेल कीमतों का असर सीधे अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
ज्यादा एथेनॉल इस्तेमाल होने से कच्चे तेल का आयात कम हो सकता है, ऊर्जा सुरक्षा बढ़ सकती है और देश का फ्यूल इंपोर्ट बिल घट सकता है।