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जो कभी हुआ ही नहीं, उसे भी सच मानने लगेगा दिमाग? AI की फर्जी तस्वीरों पर वैज्ञानिकों की बड़ी चेतावनी

क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि कोई घटना हुई थी, लेकिन बाद में पता चला कि वह सच नहीं थी? वैज्ञानिकों की नई रिसर्च AI को लेकर एक हैरान करने वाला खतरा सामने लाई है। फर्जी तस्वीरें और AI चैटबॉट कुछ परिस्थितियों में आपके दिमाग में ऐसी यादें पैदा कर सकते हैं, जिनका हकीकत से कोई संबंध नहीं। जानिए पूरी रिसर्च।

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AI चैटबॉट और फर्जी तस्वीरें बदल सकती हैं इंसानों की यादें। (AI जनरेटेड तस्वीर)
AI चैटबॉट और फर्जी तस्वीरें बदल सकती हैं इंसानों की यादें। (AI जनरेटेड तस्वीर)

In Short

  • AI से बदली तस्वीरें लोगों की याददाश्त को प्रभावित कर सकती हैं।
  • चैटबॉट से बातचीत करने वालों में तीन गुना से ज्यादा गलत यादें दर्ज।
  • AI से बनी सामग्री की चेतावनी भी हमेशा गलत यादों को नहीं रोक पाई।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। लोग जानकारी लेने, तस्वीरें बनाने और रोजमर्रा के सवालों के जवाब पाने के लिए AI चैटबॉट का सहारा ले रहे हैं। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इसके एक नए खतरे को लेकर चेतावनी दी है। रिसर्च के मुताबिक, AI से बनी फर्जी तस्वीरें, वीडियो और गलत जानकारी इंसानों की याददाश्त को प्रभावित कर सकती हैं। कई बार लोग ऐसी घटनाओं को भी सच मानने लगते हैं, जो वास्तव में कभी हुई ही नहीं।

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AI की फर्जी तस्वीरें कैसे बदल रही हैं यादें?

मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) की वैज्ञानिक पैटी मेस ने एक रिसर्च के नतीजे साझा किए हैं। इसमें कुछ लोगों को सामान्य तस्वीरें दिखाई गईं। थोड़ी देर बाद कुछ लोगों को वही तस्वीरें दोबारा दिखाई गईं, जबकि बाकी लोगों को AI से बदली गई तस्वीरें दिखाई गईं।

बाद में जब उनकी याददाश्त जांची गई, तो AI से बदली तस्वीरें देखने वाले लोगों ने असली तस्वीरों के बारे में ज्यादा गलत बातें याद कीं। हैरानी की बात यह थी कि उन्हें अपनी गलत यादों पर पूरा भरोसा भी था।

AI चैटबॉट से बातचीत भी बन सकती है परेशानी

MIT Media Lab की एक अन्य स्टडी में पाया गया कि AI चैटबॉट से सवाल-जवाब करने वाले लोगों में गलत यादें बनने की संभावना बढ़ सकती है। रिसर्च में चैटबॉट से बातचीत करने वाले लोगों ने दूसरे समूह के मुकाबले तीन गुना से ज्यादा गलत यादें बताईं।

वहीं, जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी की रिसर्च में पाया गया कि किसी वीडियो की AI से तैयार गलत समरी पढ़ने के बाद लोगों की सही जानकारी याद रखने की क्षमता प्रभावित हुई। एक ट्रैफिक साइन को सही पहचानने की दर 83.6 फीसदी से घटकर 44.8 फीसदी रह गई।

AI की चेतावनी के बाद भी क्यों हो रही गलती?

रिसर्च के मुताबिक, लोगों को यह बता देना कि कोई तस्वीर या जानकारी AI से बनाई गई है, हमेशा पर्याप्त नहीं होता।

दरअसल, इंसानी दिमाग पहले से ही बाहरी जानकारी से प्रभावित हो सकता है। AI जब किसी गलत जानकारी को पूरे आत्मविश्वास के साथ पेश करता है, तो लोग उसे सच मान सकते हैं।

वैज्ञानिक इसे फॉल्स मेमोरी यानी ऐसी गलत याद कहते हैं, जिसमें व्यक्ति को लगता है कि कोई घटना सचमुच हुई थी।

आम लोगों के लिए कितना बड़ा खतरा?

विशेषज्ञों का कहना है कि AI पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। खासकर स्वास्थ्य, बैंकिंग और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में गलत जानकारी गंभीर फैसलों को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए AI से मिली जानकारी को बिना जांचे सच नहीं मानना चाहिए। महत्वपूर्ण तथ्यों की पुष्टि भरोसेमंद स्रोतों से करना जरूरी है।

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हालांकि इन अध्ययनों से यह साबित नहीं होता कि हर AI चैटबॉट या AI तस्वीर गलत यादें पैदा करती है। रिसर्च यह दिखाती है कि कुछ परिस्थितियों में AI से तैयार भ्रामक सामग्री इंसानी याददाश्त को प्रभावित कर सकती है।