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78 दिनों तक सरकार ने संभाला बोझ, फिर बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम; अब भी OMCs को हर दिन ₹650 करोड़ का नुकसान

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और महंगे कच्चे तेल के बीच पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। आखिर कई हफ्तों तक दाम कैसे नहीं बढ़े, सरकार ने क्या कदम उठाए और अब तेल कंपनियां किस चुनौती का सामना कर रही हैं? पूरी कहानी में जानिए इसके पीछे की पूरी वजह।

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AI Generated Image

Petrol-Diesel Price: मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और ग्लोबल स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर भारत के फ्यूल मार्केट पर भी देखने को मिला है।

जब फरवरी के अंत में यूएस-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध शुरू हुआ था और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल महंगा हुआ था तो उसके बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को तत्काल नहीं बढ़ाया गया था। सरकार और तेल कंपनियों ने मिलकर ग्राहकों को राहत देने की कोशिश की थी ताकि आम लोगों पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ न पड़े।

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78 दिनों तक नहीं बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम

सूत्रों के अनुसार, युद्ध शुरू होने के बाद करीब 78 दिनों तक ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की थी। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लागत लगातार बढ़ रही थी, लेकिन इसका पूरा असर ग्राहकों तक नहीं पहुंचने दिया गया।

जानकारी के मुताबिक, इस अवधि में वित्त मंत्रालय ने तेल कंपनियों को कुल ₹1.23 लाख करोड़ का मुआवजा दिया था। यह राशि इसलिए दी गई ताकि पेट्रोल और डीजल पर बढ़ी लागत का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर न डाला जाए और बाजार में कीमतें कंट्रोल रखी जा सकें।

बाद में बढ़ाए गए ईंधन के दाम

हालांकि लंबे समय तक कीमतों को स्थिर रखना संभव नहीं हो सका। 78 दिनों की अवधि पूरी होने के बाद तेल कंपनियों ने देशभर में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने शुरू किए। तब से लेकर अब तक कई चरणों में कीमतों में बढ़ोतरी हुई है और कुल मिलाकर पेट्रोल-डीजल लगभग 7 रुपये प्रति लीटर तक महंगा हो चुका है।

अब भी घाटे में तेल बेच रहीं कंपनियां

दाम बढ़ाए जाने के बावजूद तेल कंपनियों की मुश्किलें पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। सरकारी सूत्रों के अनुसार, मौजूदा समय में भी तेल कंपनियां ग्लोबल कच्चे तेल की मौजूदा कीमतों की तुलना में कम दर पर पेट्रोल और डीजल बेच रहे हैं। इसके कारण कंपनियों को प्रतिदिन लगभग ₹650 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है।