Noida Bus Fire: बस बॉडी कोड से इमरजेंसी एग्जिट तक सब तय, फिर भी यात्रियों की जिंदगी क्यों खतरे में?
यमुना एक्सप्रेस-वे पर स्लीपर बस में लगी आग ने एक बार फिर यात्री सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। महोबा जा रही बस हादसे में 9 लोगों की मौत हुई। नियमों और सुरक्षा मानकों के बावजूद स्लीपर बसों की डिजाइन, फिटनेस और इमरजेंसी सिस्टम को लेकर कई सवाल सामने आए हैं।

In Short
- यमुना एक्सप्रेस-वे पर महोबा जा रही स्लीपर बस में लगी आग, 9 यात्रियों की मौत।
- AC में स्पार्क के बाद आग फैलने की आशंका, बस में सवार थे 30-35 यात्री।
- स्लीपर बसों की सुरक्षा, AIS-052 नियम और इमरजेंसी एग्जिट को लेकर उठे सवाल।
रात का सफर था और मंजिल महोबा थी, लेकिन यमुना एक्सप्रेस-वे पर दौड़ रही एक स्लीपर बस कुछ यात्रियों के लिए जिंदगी का आखिरी सफर बन गई। बुधवार रात जेवर थाना क्षेत्र में दिल्ली से महोबा जा रही राज कल्पना ट्रैवल्स की स्लीपर बस में अचानक आग लग गई। देखते ही देखते पूरी बस लपटों से घिर गई।
बस में करीब 30-35 यात्री सवार थे। हादसे में 9 यात्रियों की मौत हो गई, जबकि कई लोगों को रेस्क्यू कर सुरक्षित बाहर निकाला गया। पुलिस ने चालक और परिचालक को हिरासत में लेकर जांच शुरू कर दी है।
AC में स्पार्क के बाद फैली आग
शुरुआती पुलिस जांच के मुताबिक बस के AC में स्पार्क या ब्लास्ट के बाद इंजन के लुब्रिकेंट ऑयल ने आग पकड़ ली। इसके बाद आग तेजी से पूरी बस में फैल गई। रात का समय होने के कारण कई यात्री सो रहे थे और उन्हें संभलने तक का मौका नहीं मिला।
हादसे ने एक बार फिर स्लीपर बसों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल सिर्फ आग लगने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि आग लगने के बाद यात्री कितनी जल्दी बस से बाहर निकल सकते हैं।
स्लीपर बसों में एग्जिट सबसे बड़ी चिंता
स्लीपर बसों में यात्री सीट पर नहीं बल्कि छोटे बंद स्पेस में लेटे होते हैं। ऐसे में आग लगने के बाद कुछ सेकेंड का धुआं भी खतरनाक साबित हो सकता है।
अगर इमरजेंसी गेट छोटा हो, रास्ता सामान या सीट से घिरा हो, खिड़की आसानी से न खुले या फायर डिटेक्शन सिस्टम मौजूद न हो तो खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि स्लीपर बसों की डिजाइन सिर्फ ज्यादा बर्थ लगाने का मामला नहीं है, बल्कि यह यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
ज्यादा बर्थ और मुनाफे के बीच सुरक्षा का सवाल
देश में लंबे समय तक कई बसें लोकल और मैनुअल बॉडी बिल्डर्स के जरिए तैयार होती रही हैं। बस ऑपरेटर अपनी जरूरत के हिसाब से बस में बदलाव करवाते रहे हैं।
कितनी बर्थ होंगी, अंदर कितना स्पेस होगा और सामान रखने की जगह कहां होगी, इन चीजों में कई बार ज्यादा क्षमता और मुनाफे पर ध्यान दिया जाता है। लेकिन इमरजेंसी एग्जिट, फायर सेफ्टी सिस्टम और यात्रियों की सुरक्षित निकासी जैसे मुद्दे सबसे ज्यादा जरूरी होते हैं।
सरकार ने स्लीपर बसों के लिए बनाए हैं नियम
सरकार ने स्लीपर बसों की सुरक्षा के लिए AIS-052 और AIS-119 जैसे नियम बनाए हैं। फरवरी 2026 में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को इन नियमों के पालन को लेकर एडवाइजरी भी जारी की गई थी।
जांच में कुछ बसों में सुरक्षा खामियां सामने आई थीं। इनमें तय सीमा से ज्यादा लंबाई, छोटे इमरजेंसी दरवाजे, रास्ते में रुकावट और फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम की कमी जैसी बातें शामिल थीं।
जनवरी 2026 में सरकार ने स्लीपर कोच बसों के निर्माण को लेकर नियम और सख्त किए थे। इसके तहत बसों का निर्माण केवल मान्यता प्राप्त कंपनियों या सुविधाओं में करने पर जोर दिया गया।
सड़क पर अब भी बना हुआ है बड़ा सवाल
नियम, फिटनेस जांच और सुरक्षा मानक होने के बावजूद अगर बस कुछ ही मिनटों में मौत का जाल बन जाती है तो सवाल उठना तय है। जांच में यह देखना जरूरी है कि बस की बॉडी किसने बनाई, फिटनेस सर्टिफिकेट किस आधार पर मिला, इमरजेंसी एग्जिट काम करने लायक था या नहीं, फायर सेफ्टी सिस्टम मौजूद था या नहीं और क्या बस में तय संख्या से ज्यादा यात्री थे।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने सितंबर 2026 में कहा था कि 2024 में बस हादसों में 3,855 लोगों की मौत हुई। उन्होंने बस बॉडी से जुड़े नियमों के सख्त पालन पर जोर दिया था।
स्लीपर बस में सफर करने वाला यात्री सिर्फ आरामदायक सीट नहीं खरीदता, वह अपनी सुरक्षा का भरोसा भी करता है। इसलिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुसीबत के समय बाहर निकलने का रास्ता कितना सुरक्षित है।