57 टनल, 226 ब्रिज, 108 कर्व... वेस्टर्न घाट में वंदे भारत चलाना क्यों था रेलवे के लिए बड़ा मिशन

वेस्टर्न घाट की मुश्किल पहाड़ियों, सुरंगों और पुलों के बीच वंदे भारत ट्रेन का ट्रायल रन पूरा हुआ। बेंगलुरु-मंगलुरु रूट पर इस हाईस्पीड ट्रेन को चलाने के लिए रेलवे ने सुरक्षा सिस्टम, इलेक्ट्रिफिकेशन और तकनीकी तैयारियों पर खास ध्यान दिया। अब अंतिम मंजूरियों के बाद सेवा शुरू होने का इंतजार है।

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In Short

  • बेंगलुरु-मंगलुरु वंदे भारत का ट्रायल रन 55 किलोमीटर लंबे पहाड़ी रूट पर हुआ, जहां 57 सुरंगें, 226 पुल और 108 तीखे मोड़ हैं।
  • पहाड़ी ढलानों और चुनौतीपूर्ण रास्तों को देखते हुए वंदे भारत में ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम (AEBS) लगाने की जरूरत पड़ी।
  • ट्रायल पूरा होने के बाद रेलवे अब सुरक्षा मंजूरियों, टाइमटेबल और स्टॉपेज तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा।

By Gaurav Kumar:

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वंदे भारत ट्रेन का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें ऑरेंज-ब्लैक रंग की ट्रेन पहाड़ों, घने जंगलों और धुंध के बीच सुरंगों से गुजरती नजर आ रही है। ड्रोन कैमरे में कैद यह नजारा बेंगलुरु-मंगलुरु के बीच वेस्टर्न घाट सेक्शन में वंदे भारत के ट्रायल रन का है।

इस खूबसूरत सफर के पीछे रेलवे की बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती और कई स्तर की सुरक्षा जांच शामिल है। कर्नाटक के इस पहाड़ी रूट पर वंदे भारत चलाना आसान नहीं था, क्योंकि यहां कई प्राकृतिक और तकनीकी चुनौतियां मौजूद हैं।

55 किलोमीटर के रूट पर 57 सुरंगें और 226 पुल

कर्नाटक के वेस्टर्न घाट में इस रूट को साकलेशपुर-सुब्रह्मण्य रोड सेक्शन या शिराडी घाट सेक्शन के नाम से जाना जाता है। करीब 55 किलोमीटर लंबे इस हिस्से में 57 सुरंगें, 226 पुल और 108 तीखे मोड़ हैं।

इस सेक्शन में हर 50 मीटर की क्षैतिज दूरी पर ऊंचाई में करीब 1 मीटर का बदलाव आता है। इसके अलावा कई हिस्से लैंडस्लाइड प्रोन यानी भूस्खलन के खतरे वाले हैं। यही वजह है कि इस रूट पर ट्रेन संचालन के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ी।

इलेक्ट्रिफिकेशन में आई कई मुश्किलें

इस सेक्शन का इलेक्ट्रिफिकेशन दिसंबर 2023 में शुरू हुआ था और दिसंबर 2025 में पूरा किया गया। करीब 55 किलोमीटर के क्षेत्र में ओवरहेड इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट लगाए गए और 5 स्विचिंग स्टेशन तैयार किए गए।

इस प्रोजेक्ट पर करीब ₹93.5 करोड़ खर्च हुए। पहाड़ी इलाके और कई जगहों पर सड़क संपर्क मुश्किल होने के कारण रेलवे को निर्माण सामग्री और उपकरण ट्रेन के जरिए पहुंचाने पड़े। सुरंगों के अंदर काम करना भी इस प्रोजेक्ट की बड़ी चुनौतियों में शामिल था।

वंदे भारत के लिए बदले गए सुरक्षा सिस्टम

इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा होने के बाद इस रूट पर मालगाड़ियों और पैसेंजर ट्रेनों को चलाने की मंजूरी मिल गई थी, लेकिन वंदे भारत के लिए अतिरिक्त सुरक्षा जरूरतें सामने आईं।

वंदे भारत एक सेल्फ-प्रोपेल्ड ट्रेनसेट है, जिसमें अलग इंजन की जरूरत नहीं होती। ट्रेन के डिब्बों के नीचे ही मोटर और इंजन लगे होते हैं।

वेस्टर्न घाट की तीखी ढलानों को देखते हुए रेलवे ने इसमें ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग सिस्टम (AEBS) की जरूरत महसूस की। मौजूदा वंदे भारत ट्रेनसेट में यह सिस्टम नहीं था, इसलिए इसे अलग से फिट करने का फैसला लिया गया।

ट्रायल रन में हर पहलू की हुई जांच

इस रूट पर वंदे भारत का ट्रायल रन पूरा हो चुका है। बारिश और चुनौतीपूर्ण रास्ते को देखते हुए ट्रेन को नियंत्रित गति से चलाया गया।

रेलवे की मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, ऑपरेशन और सिक्योरिटी टीमों ने ट्रायल की निगरानी की। रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन (RDSO) ने ट्रेन की परफॉर्मेंस का आकलन किया।

Image Credit : Aaj Tak

टेस्टिंग में सिर्फ ट्रेन की स्पीड और रनिंग नहीं बल्कि इमरजेंसी और ऑपरेशनल परिस्थितियों में इसके प्रदर्शन को भी जांचा गया।

बेंगलुरु-मंगलुरु वंदे भारत का इंतजार

अब बेंगलुरु से मंगलुरु के बीच वंदे भारत सेवा कब शुरू होगी, इसका फैसला रेलवे को लेना है। ट्रायल रन में एक तरफ का सफर करीब 8.5 घंटे का रखा गया था।

संभावित स्टॉपेज में हासन, साकलेशपुर और सुब्रह्मण्य रोड जैसे स्टेशन शामिल हैं। रूट, टाइमटेबल और स्टॉपेज पर अंतिम फैसला जरूरी सुरक्षा मंजूरियों के बाद लिया जाएगा। आगे इस ट्रेन को मडगांव तक बढ़ाने की बात भी सामने आ चुकी है, लेकिन अंतिम फैसला रेलवे बोर्ड करेगा।

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