यूएस ने बांग्लादेश को टेक्सटाइल पर दिया टैरिफ छूट! फिर भी भारत मजबूत स्थिति में - जानिए कैसे

एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस समझौते का भारत के घरेलू उत्पादकों और टेक्सटाइल उद्योग पर प्रभाव सीमित और अस्थायी हो सकता है, क्योंकि भारत ग्लोबल कॉटन  प्रोड्यूसर में अग्रणी है, घरेलू खपत मजबूत है और एक्सपोर्ट डायवरसिफाइड हैं।

Advertisement
AI Generated Image

By Gaurav Kumar:

अमेरिका-बांग्लादेश व्यापार समझौते ने भारत में निवेशकों और कॉटन उत्पादकों के बीच चिंता पैदा कर दी है। इस समझौते के  प्रावधानों के अनुसार, अगर बांग्लादेश अपने टेक्सटाइल एक्सपोर्ट  में अमेरिकी कॉटन को प्रमुख कच्चे माल के रूप में उपयोग करता है, तो उसे अमेरिका में जीरो प्रतिशत टैरिफ का लाभ मिलेगा। 

एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस समझौते का भारत के घरेलू उत्पादकों और टेक्सटाइल उद्योग पर प्रभाव सीमित और अस्थायी हो सकता है, क्योंकि भारत ग्लोबल कॉटन  प्रोड्यूसर में अग्रणी है, घरेलू खपत मजबूत है और एक्सपोर्ट डायवरसिफाइड हैं।
 
भारत का नाम विश्व के सबसे बड़े रॉ कॉटन उत्पादक देशों में शामिल है जो लगभग 21 से 23 प्रतिशत हिस्सा रखता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का उत्पादन लगभग 29.4 मिलियन गांठ रहा। भारत के कॉटन एक्सपोर्ट  में अमेरिका का हिस्सा 26.35 प्रतिशत है, जबकि बांग्लादेश का हिस्सा लगभग 20 प्रतिशत है।

भारत पर 18% टैरिफ

भारत और अमेरिका द्वारा टेक्सटाइल सहित विभिन्न वस्तुओं पर रेसिप्रोकल टैरिफ कम करने संबंधित जॉइंट स्टेटमेंट जारी करने के कुछ ही दिनों बाद, अमेरिका-बांग्लादेश की यह खबर सामने आई है। वर्तमान में भारतीय कॉटन और टेक्सटाइल एक्सपोर्ट पर अमेरिका में 18 प्रतिशत टैरिफ लगता है, जबकि बांग्लादेश अमेरिकी कॉटन का उपयोग करके जीरो प्रतिशत टैरिफ का लाभ उठा सकता है।

बांग्लादेश से घबराने की क्यों नहीं है जरूरत?

भारत न केवल अमेरिका और बांग्लादेश दोनों को कॉटन और टेक्सटाइल का प्रमुख निर्यातक है, बल्कि बांग्लादेश का उद्योग ऐतिहासिक रूप से भारतीय कॉटन  पर निर्भर रहा है। कच्चे माल के स्रोत में बदलाव से बांग्लादेशी उद्योग की ऑपरेटिंग लागत बढ़ सकती है। इसके अलावा, अमेरिका से बांग्लादेश को कॉटन  आयात करने पर अधिक समुद्री भाड़ा, कस्टम क्लीयरेंस, शिपिंग अस्थिरता और अमेरिकी बाजार के उतार-चढ़ाव जैसे कारकों का प्रभाव पड़ेगा।

इसी बीच, भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता और ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया आदि के साथ आर्थिक व्यवस्थाओं ने भारतीय वस्त्रों के लिए यूरोपीय और अन्य उभरते बाजारों के द्वार खोले हैं। 

Read more!
Advertisement