भारत-पाक युद्ध में क्या सऊदी देगा पाकिस्तान का साथ? नई रक्षा डील पर पूर्व ब्रिटिश मंत्री का बड़ा दावा
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के नए रक्षा समझौते को लेकर रणनीतिक सवाल उठने लगे हैं। ब्रिटेन के पूर्व मंत्री रोरी स्टीवर्ट ने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी संघर्ष की स्थिति में सऊदी अरब युद्ध में उतरने से बचना चाहेगा। जानिए इस गठबंधन को लेकर क्या हैं बड़े सवाल।

In Short
- सऊदी अरब पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए रक्षा समझौते पर रोरी स्टीवर्ट ने कहा कि भारत पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में सऊदी युद्ध में शामिल होने से बचना चाहेगा।
- तीनों देशों के गठबंधन में नाटो जैसी व्यवस्था का प्रावधान है लेकिन अभी इसमें नाटो जैसी साझा कमांड और सैन्य एकीकरण नहीं है।
- भारत सरकार ने इस समझौते पर संतुलित प्रतिक्रिया दी है और इसे सऊदी अरब के भारत से दूर जाने के संकेत के तौर पर नहीं देखा है।
सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए नए रक्षा समझौते को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। ब्रिटेन के पूर्व मंत्री रोरी स्टीवर्ट ने कहा है कि सऊदी अरब भारत के साथ किसी संभावित युद्ध में शामिल नहीं होना चाहेगा, भले ही उसने पाकिस्तान और तुर्की के साथ नया रक्षा समझौता किया है।
स्टीवर्ट ने ब्रिटिश पत्रकार और रणनीतिकार अलास्टर कैंपबेल के पॉडकास्ट में यह बात कही। तीनों देशों ने 7 अगस्त को मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में नाटो जैसी व्यवस्था का प्रावधान है, जिसके तहत किसी एक देश पर हमला होने को तीनों पर हमला माना जाएगा।
पाकिस्तान और सऊदी के बीच पुराना सैन्य सहयोग
रोरी स्टीवर्ट ने कहा कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग लंबे समय से चला आ रहा है। पाकिस्तानी पायलटों ने सऊदी अरब में प्रशिक्षण लिया है और वहां सऊदी विमानों को उड़ाया है। इसके अलावा पाकिस्तानी सैन्य मिशन भी सऊदी अरब में काम करते रहे हैं।
हालांकि, उन्होंने कहा कि नया समझौता अलग है क्योंकि इसमें सऊदी अरब और तुर्की की बढ़ती आर्थिक और सैन्य ताकत भी शामिल है। तुर्की नाटो का सदस्य भी है।
भारत पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में क्या होगा सवाल
स्टीवर्ट ने कहा कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष होता है तो यह समझौता किस तरह काम करेगा। उन्होंने कहा कि सऊदी अरब भारत के साथ युद्ध में शामिल नहीं होना चाहेगा।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या तुर्की और पाकिस्तान ईरान के खिलाफ सऊदी अरब की रक्षा के लिए आगे आएंगे, क्योंकि दोनों देशों के ईरान के साथ संबंध सऊदी अरब की तुलना में ज्यादा नरम रहे हैं।
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कैंपबेल ने कहा कि पाकिस्तान की विदेश नीति पर भारत के साथ उसके संबंधों का बड़ा असर रहता है। उन्होंने बताया कि भारतीय मीडिया के कुछ हिस्सों ने इस समझौते को "इस्लामिक नाटो", "मुस्लिम नाटो" या "सुन्नी नाटो" जैसे नाम दिए हैं।
अमेरिका की भूमिका को लेकर भी उठे सवाल
स्टीवर्ट ने अमेरिका की ओर से इस समझौते को क्षेत्रीय जिम्मेदारी बांटने की कोशिश बताने पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह असल में बोझ बांटना नहीं है, क्योंकि ऐसे समझौते में अमेरिका का कमांड और कंट्रोल कमजोर हो सकता है।
उनके मुताबिक पहले अमेरिका की सेंट्रल कमांड क्षेत्रीय सरकारों के साथ मिलकर काम करती थी और अमेरिकी सैन्य संसाधन भी मौजूद थे, लेकिन नए समझौते में अमेरिका की कोई सीधी भूमिका दिखाई नहीं देती।
क्या नाटो की तरह काम कर पाएगा गठबंधन
स्टीवर्ट ने कहा कि यह गठबंधन अभी नाटो जैसी सैन्य ताकत नहीं रखता। नाटो के पास साझा कमांड सिस्टम, मुख्यालय और सैनिकों, हथियारों व संसाधनों के तालमेल के लिए मजबूत व्यवस्था है।
उन्होंने कहा कि अभी तक सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच ऐसी सैन्य एकीकरण व्यवस्था दिखाई नहीं देती। तीनों देशों की नीतियों में भी अंतर है।
भारत ने दी है संभली हुई प्रतिक्रिया
कैंपबेल के मुताबिक, भारत सरकार ने इस समझौते पर मीडिया के मुकाबले ज्यादा संभलकर प्रतिक्रिया दी। भारत ने यह दिखाने की कोशिश की कि वह इस डील को सऊदी अरब के भारत से दूर जाने के तौर पर नहीं देखता। भारत ने इस मुद्दे को ज्यादा बड़ा नहीं बनाया, जिससे पाकिस्तान को मिलने वाला राजनीतिक फायदा भी कम हो गया।