ग्रामीण भारत से सीखनी होगी सस्टेनेबिलिटी, डाबर डायरेक्टर आदित्य बर्मन ने बताई बड़ी वजह
बिजनेस टुडे इंडिया के मोस्ट सस्टेनेबल कंपनीज समिट एंड अवॉर्ड्स 2026 में उन्होंने कहा कि वास्तव में संपन्न कंज्यूमर्स के लिए जिम्मेदारी के साथ कंज्यूम करना अधिक कठिन होता है।

सस्टेनेबिलिटी को अक्सर शहरी और जागरूक कंज्यूमर्स से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन डाबर इंडिया के डायरेक्टर आदित्य बर्मन का मानना है कि असल जिम्मेदार कंजम्पशन की संस्कृति लंबे समय से ग्रामीण भारत में मौजूद रही है। बिजनेस टुडे इंडिया के मोस्ट सस्टेनेबल कंपनीज समिट एंड अवॉर्ड्स 2026 में उन्होंने कहा कि वास्तव में संपन्न कंज्यूमर्स के लिए जिम्मेदारी के साथ कंज्यूम करना अधिक कठिन होता है।
बर्मन ने कहा कि ग्रामीण उपभोक्ता सालों से अपने बैग और कंटेनर लेकर दुकानों पर जाते रहे हैं। यह व्यवहार तब से मौजूद है जब सस्टेनेबिलिटी जैसे शब्द आम चर्चा का हिस्सा भी नहीं थे।
140 साल पुराना वादा आज भी कायम
डाबर की विरासत का जिक्र करते हुए बर्मन ने कहा कि कंपनी की स्थापना ऐसे समय में हुई थी जब प्रोडक्ट की क्वालिटी एक जैसी नहीं थी और कंज्यूमर्स को यह तक पता नहीं होता था कि वे क्या खरीद रहे हैं। उस दौर में डाबर ने ग्राहकों से एक सीधा वादा किया था कि उन्हें बताया जाएगा कि प्रोडक्ट के अंदर क्या है। उनके मुताबिक, यही ट्रांसपेरेंसी आज भी कंपनी की सोच का आधार बनी हुई है।
जितना प्लास्टिक इस्तेमाल, उससे ज्यादा पर्यावरण से हटाया
सस्टेनेबिलिटी के मोर्चे पर डाबर की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए बर्मन ने कहा कि कंपनी अब पर्यावरण से उतना नहीं, बल्कि उससे अधिक प्लास्टिक निकाल रही है जितना वह बाजार में डालती है। उनका दावा है कि ऐसा करने वाली डाबर भारत की पहली एफएमसीजी कंपनी हो सकती है। उन्होंने इसका श्रेय देश में तेजी से बन रही रीसाइक्लिंग इकोसिस्टम को दिया।
बदल रहा है कंज्यूमर्स का नजरिया
बर्मन ने कहा कि डिजिटल पहुंच बढ़ने के साथ शहरी और ग्रामीण भारत के बीच का अंतर तेजी से कम हो रहा है। आज दोनों वर्गों के उपभोक्ताओं के पास समान जानकारी और विचारों तक पहुंच है।
उन्होंने कहा कि युवा उपभोक्ता अब उत्पादों के घटकों, उनकी सोर्सिंग और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर ज्यादा सवाल पूछ रहे हैं। डाबर इन सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है।