पायलटों के ड्रग टेस्ट पर बड़ा अपडेट, DGCA को भेजा गया ये नया प्रस्ताव
FIP के अध्यक्ष कैप्टन सीएस रंधावा ने 17 अगस्त 2026 को DGCA को भेजे पत्र में कहा कि नई व्यवस्था से जांच प्रक्रिया तेज और ज्यादा व्यापक हो सकती है, जबकि सुरक्षा मानकों को बनाए रखा जा सकता है।

In Short
- फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) ने DGCA से पायलटों की ड्रग जांच में सैलिवा यानी ओरल-फ्लूड टेस्ट शामिल करने का सुझाव दिया है।
- FIP ने यूरिन टेस्ट को हटाने के बजाय हाइब्रिड सिस्टम की मांग की है, जिसमें जरूरत के हिसाब से दोनों तरीकों का इस्तेमाल हो।
- संगठन ने रैंडम ड्रग टेस्टिंग बढ़ाने, पायलटों के लिए जागरूकता कार्यक्रम और 12 महीने का पायलट प्रोग्राम चलाने का प्रस्ताव दिया है।
फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स (FIP) ने पायलटों की साइकोएक्टिव सब्सटेंस जांच प्रक्रिया को आधुनिक बनाने की मांग की है। संगठन ने डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) से कहा है कि पायलटों की जांच में ओरल-फ्लूड यानी सैलिवा ड्रग टेस्ट को शामिल किया जाए। FIP के अध्यक्ष कैप्टन सीएस रंधावा ने 17 अगस्त 2026 को DGCA को भेजे पत्र में कहा कि नई व्यवस्था से जांच प्रक्रिया तेज और ज्यादा व्यापक हो सकती है, जबकि सुरक्षा मानकों को बनाए रखा जा सकता है।
यूरिन टेस्ट के साथ सैलिवा टेस्ट का प्रस्ताव
FIP ने मौजूदा यूरिन आधारित टेस्ट को तुरंत हटाने की मांग नहीं की है। संगठन ने जोखिम आधारित हाइब्रिड सिस्टम का सुझाव दिया है, जिसमें नियमित, रैंडम और बड़े स्तर की जांच के लिए सैलिवा टेस्ट का इस्तेमाल किया जा सके। वहीं, ऐसे मामलों में जहां लंबे समय तक किसी पदार्थ की मौजूदगी का पता लगाना जरूरी हो, वहां यूरिन टेस्ट जारी रखा जा सकता है।FIP ने ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और UAE की एविएशन अथॉरिटी के उदाहरण देते हुए कहा कि इन देशों में एविएशन कर्मचारियों की जांच के लिए यूरिन और ओरल-फ्लूड दोनों तरीकों को मान्यता दी गई है।
एयरपोर्ट पर तेजी से हो सकेगी जांच
FIP के अनुसार, सैलिवा टेस्ट का सबसे बड़ा फायदा इसकी आसान और तेज प्रक्रिया है। संगठन ने कहा कि ओरल-फ्लूड सैंपल लेना आसान, सीधे निगरानी में किया जा सकता है और एयरपोर्ट या कार्यस्थल के पास भी संभव है। FIP के एक अध्ययन में 45 मिनट की यूरिन सैंपल प्रक्रिया और 15 मिनट की सैलिवा सैंपल प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए कहा गया कि इससे सैंपल कलेक्शन का काम करीब 66.7% तक कम हो सकता है। हालांकि, संगठन ने साफ किया कि यह सिर्फ एक अनुमान है और इसे भारतीय परिस्थितियों में जांचना जरूरी होगा।
पॉजिटिव टेस्ट का मतलब नशे की हालत नहीं
FIP ने यह भी कहा कि किसी पदार्थ की मौजूदगी का पता चलना सीधे तौर पर यह साबित नहीं करता कि पायलट उड़ान के दौरान प्रभावित था। संगठन ने कहा कि किसी भी टेस्ट को अपने आप खराब प्रदर्शन या असुरक्षित व्यवहार का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।FIP ने जांच प्रक्रिया में स्क्रीनिंग, कन्फर्मेटरी लैब टेस्ट, मेडिकल रिव्यू और अंतिम नियामकीय निर्णय की मौजूदा व्यवस्था जारी रखने की मांग की है।
रैंडम टेस्टिंग बढ़ाने का सुझाव
FIP ने DGCA से पायलटों की वार्षिक रैंडम टेस्टिंग कवरेज को मौजूदा 10% से बढ़ाकर कम से कम 25% करने का सुझाव दिया है। संगठन का कहना है कि उद्देश्य सिर्फ संख्या पूरी करना नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें पूरे साल जांच की संभावना बनी रहे।
इसके अलावा FIP ने पायलटों के लिए "Check Before You Take" जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने की मांग की है, जिसमें सर्दी-जुकाम की दवाओं, नींद की दवाओं, हर्बल सप्लीमेंट और प्रिस्क्रिप्शन दवाओं की जानकारी दी जाए।
12 महीने का पायलट प्रोग्राम प्रस्तावित
FIP ने DGCA को सुझाव दिया है कि चुनिंदा एयरलाइंस और एयरपोर्ट पर 12 महीने का नियंत्रित पायलट प्रोग्राम चलाया जाए। इसमें ओरल-फ्लूड और यूरिन टेस्ट की तुलना कर भारतीय परिस्थितियों के हिसाब से बेहतर व्यवस्था तैयार की जा सके।यह मांग ऐसे समय आई है जब एयर इंडिया की फ्लाइट AI2379 में तकनीकी खराबी के बाद हुई घटना और पायलट के ड्रग टेस्ट को लेकर चर्चा तेज हुई थी।