लाहौर ने बदले इन इलाकों के नाम! इस्लामपुरा फिर बना कृष्णनगर, लक्ष्मी चौक और जैन मंदिर चौक का नाम भी शामिल
पाकिस्तान के लाहौर में ऐसा बदलाव हुआ है, जिसने हर किसी को चौंका दिया। दशकों बाद शहर की कई मशहूर जगहों के नाम बदलकर उन्हें उनकी पुरानी ऐतिहासिक पहचान वापस दी गई है। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि इस फैसले पर किसी बड़े विरोध की खबर सामने नहीं आई।

भारत के अमृतसर से महज 50 किलोमीटर दूर बसा यह ऐतिहासिक शहर लाहौर, दशकों तक कट्टर इस्लामीकरण के शिकंजे में रहने के बाद अब अपनी पुरानी जड़ों की ओर लौट रहा है। लाहौर प्रशासन ने पिछले दो महीनों के अदर 9 प्रमुख जगहों के इस्लामी नाम बदलकर उन्हें पुराने हिंदू और ब्रिटिश काल के मूल नामों पर बहाल कर दिया है।
पाकिस्तानी न्यूज वेबसाइट Pakistan Today और Pro Pakistani के मुताबिक इस बड़े बदलाव के तहत अब 'इस्लामपुरा' को आधिकारिक रूप से अपने पुराने नाम 'कृष्णनगर' और 'बाबरी मस्जिद चौक' को 'जैन मंदिर चौक' के नाम से जाना जाएगा। शहर में इन पुराने नामों के नए बोर्ड भी लगा दिए गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस ऐतिहासिक बदलाव के खिलाफ वहां किसी भी कट्टरपंथी संगठन ने कोई विरोध प्रदर्शन या मोर्चा नहीं खोला है।
इन 9 जगहों को मिले अपने पुराने नाम
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लाहौर नगर निगम के रिकॉर्ड और सड़कों पर अब इतिहास दर्ज हो चुका है। इसके तहत इस्लामपुरा को कृष्णनगर, सुजतनगर को संतनगर और मौलाना जफर चौक को लक्ष्मी चौक का नाम वापस मिला है।
इसी तरह बाबरी मस्जिद चौक अब जैन मंदिर चौक, मुस्तफाबाद अब धर्मपुरा, और सर आगा खान चौक अब डेविस रोड कहलाएगा। इसके अलावा अल्लामा इकबाल रोड को जेल रोड, फातिमा जिन्ना रोड को क्वींस रोड और बाग-ए-जिन्ना को फिर से लॉरेंस रोड का पुराना नाम दे दिया गया है।
विरासत की बहाली से लोग खुश
लाहौर की बीकनहाउस यूनिवर्सिटी के लेक्चरर साद मलिक इस फैसले को एक बेहद सुखद बदलाव मानते हैं। साद मलिक कहते हैं कि प्रशासन ने अपने कागजों में भले ही इसका नाम मौलाना जफर अली चौक कर दिया था, लेकिन मेरे और मेरे पिता जैसे कई लोगों के लिए यह हमेशा से लक्ष्मी चौक ही रहा। यह नाम हमारी उस साझी विरासत का हिस्सा है, जिसका जफर अली खान से कोई लेना-देना नहीं है।
वहीं, जैन मंदिर के पास अनारकली इलाके के रहने वाले मौलाना वाजिद कादरी का मानना है कि इस्लाम को किसी मंदिर या गुरुद्वारे से कोई दिक्कत नहीं है। मौलाना वाजिद कादरी कहते हैं कि 1990 के दशक में जैन मंदिर चौक का नाम बदलकर बाबरी मस्जिद चौक करना महज एक सियासी फैसला था। हमने कभी इसे बाबरी मस्जिद चौक नहीं कहा। हमें समझना होगा कि जिन पूर्वजों ने ये हिंदू नाम रखे थे, वे भी मुसलमान ही थे और इससे उनके ईमान पर कोई आंच नहीं आई थी।