कोलेस्ट्रॉल गाइडलाइंस में बड़ा बदलाव; अब पहले शुरू होगी जांच और दिल की सेहत पर रहेगा ज्यादा ध्यान
अमेरिका की नई कोलेस्ट्रॉल गाइडलाइंस में कम उम्र से जांच और व्यक्तिगत इलाज पर जोर दिया गया है। डॉक्टरों का कहना है कि सिर्फ कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नहीं बल्कि पूरे दिल के खतरे को समझना जरूरी है। एलडीएल कंट्रोल और समय पर जांच से भविष्य में हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा कम हो सकता है।

In Short
- नई गाइडलाइंस में बच्चों और युवाओं में भी जल्दी कोलेस्ट्रॉल जांच शुरू करने पर जोर दिया गया है।
- एलडीएल कोलेस्ट्रॉल के लिए खतरे के हिसाब से नए लक्ष्य तय किए गए हैं 100 70 और 55 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से कम।
- डॉक्टर अब सिर्फ कोलेस्ट्रॉल नंबर नहीं बल्कि व्यक्ति की पूरी हार्ट रिस्क प्रोफाइल देखकर इलाज तय करेंगे।
अमेरिका के डॉक्टरों ने कोलेस्ट्रॉल को लेकर नई गाइडलाइंस जारी की हैं। इसमें कम उम्र से जांच शुरू करने, हर व्यक्ति के दिल की बीमारी के खतरे को अलग तरीके से समझने और खराब कोलेस्ट्रॉल एलडीएल को लंबे समय तक कंट्रोल में रखने पर जोर दिया गया है। नई गाइडलाइंस का मकसद बीमारी आने का इंतजार करने के बजाय पहले ही खतरे को पहचानना है।
कम उम्र में शुरू होगी कोलेस्ट्रॉल की जांच
नई गाइडलाइंस में कोलेस्ट्रॉल जांच को लेकर उम्र कम करने की सलाह दी गई है। अब बच्चों में भी समय रहते कोलेस्ट्रॉल की जांच करने पर जोर दिया गया है। 9 से 11 साल की उम्र के बीच बच्चों का कोलेस्ट्रॉल टेस्ट कराने की सलाह दी गई है। वहीं जिन बच्चों के परिवार में ज्यादा कोलेस्ट्रॉल या कम उम्र में दिल की बीमारी का इतिहास है उनकी जांच 2 साल की उम्र से भी शुरू की जा सकती है।
इसका उद्देश्य शरीर में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को शुरुआती दौर में पहचानना है ताकि लंबे समय तक धमनियों को होने वाले नुकसान से बचाया जा सके।
खराब कोलेस्ट्रॉल एलडीएल के लिए तय किए गए नए लक्ष्य
नई गाइडलाइंस में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को लेकर अलग अलग खतरे के स्तर के हिसाब से लक्ष्य तय किए गए हैं। जिन लोगों में दिल की बीमारी का खतरा सामान्य से थोड़ा ज्यादा है उनके लिए एलडीएल का स्तर 100 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से कम रखने की सलाह दी गई है।
जिन लोगों का खतरा ज्यादा है उनके लिए एलडीएल का लक्ष्य 70 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से कम रखा गया है। वहीं जिन लोगों को पहले से दिल की बीमारी है और उनका खतरा बहुत ज्यादा है उन्हें एलडीएल का स्तर 55 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर से नीचे रखने की सलाह दी गई है।
सिर्फ कोलेस्ट्रॉल नंबर नहीं पूरे दिल के खतरे को देखेंगे डॉक्टर
नई गाइडलाइंस में डॉक्टरों को सिर्फ कोलेस्ट्रॉल की रिपोर्ट देखकर फैसला लेने से बचने को कहा गया है। अब मरीज की पूरी सेहत और दिल की बीमारी के खतरे को ध्यान में रखकर इलाज तय किया जाएगा।
इसके लिए अपडेटेड प्रिवेंट एएससीवीडी इक्वेशन का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे किसी व्यक्ति में अगले 10 साल और 30 साल में दिल की बीमारी होने के खतरे का अनुमान लगाया जा सकेगा। इससे एक जैसे कोलेस्ट्रॉल स्तर वाले दो लोगों को भी उनकी अलग अलग स्थिति के हिसाब से इलाज मिल सकेगा।
एलपी ए टेस्ट को भी मिली ज्यादा अहमियत
नई गाइडलाइंस में लिपोप्रोटीन ए यानी एलपी ए जांच को भी ज्यादा महत्व दिया गया है। डॉक्टरों के अनुसार हर वयस्क व्यक्ति को जीवन में कम से कम एक बार एलपी ए टेस्ट कराना चाहिए।
एलपी ए एक तरह का जेनेटिक कोलेस्ट्रॉल कण होता है जो दिल की बीमारी के खतरे को बढ़ा सकता है। इसके अलावा कुछ खास मरीजों में एपोलिपोप्रोटीन बी यानी एपीओ बी जैसे अन्य संकेतकों की जांच भी मददगार हो सकती है।
लाइफस्टाइल में बदलाव अब भी सबसे जरूरी
नई गाइडलाइंस में दवाओं के साथ स्वस्थ जीवनशैली को भी जरूरी बताया गया है। संतुलित डाइट लेना नियमित एक्सरसाइज करना वजन को नियंत्रित रखना और तंबाकू से दूर रहना दिल को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाता है।
अगर सिर्फ लाइफस्टाइल बदलाव से कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल नहीं होता तो डॉक्टर स्टैटिन और दूसरी एलडीएल कम करने वाली दवाओं की सलाह दे सकते हैं।
अब इलाज का तरीका होगा ज्यादा व्यक्तिगत
नई गाइडलाइंस का सबसे बड़ा बदलाव यह है कि कोलेस्ट्रॉल मैनेजमेंट अब पहले से ज्यादा व्यक्तिगत होगा। डॉक्टर बीमारी के साफ संकेत आने का इंतजार करने के बजाय पहले ही खतरे को पहचानकर कदम उठाने पर जोर दे रहे हैं। लंबे समय तक ज्यादा कोलेस्ट्रॉल का असर शरीर पर पड़ता है इसलिए समय पर जांच और सही इलाज से हार्ट अटैक और स्ट्रोक के खतरे को कम किया जा सकता है।