Navi Pillay: पिता बस चलाते थे, बेटी ने बदला नरसंहार का कानून; नेल्सन मंडेला ने बनाया जज- अब मिला नोबेल प्राइज

बस ड्राइवर की बेटी से नोबेल शांति पुरस्कार तक पहुंचने वाली नवी पिल्लै की कहानी बेहद खास है. भारतीय मूल की इस महिला ने रंगभेद के खिलाफ लड़ाई लड़ी और एक ऐसे ऐतिहासिक फैसले में भूमिका निभाई, जिसने अंतरराष्ट्रीय कानून की दिशा बदल दी. जानिए उनका पूरा सफर.

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In Short

  • भारतीय तमिल मूल की नवी पिल्लै को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला, उनका बचपन आर्थिक तंगी में बीता था.
  • रंगभेद के खिलाफ लड़ने वाली नवी पिल्लै को 1995 में नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका की हाई कोर्ट में जज नियुक्त किया था.
  • रवांडा नरसंहार से जुड़े एक ऐतिहासिक फैसले में नवी पिल्लै ने अहम भूमिका निभाई, जिसने अंतरराष्ट्रीय कानून को नई दिशा दी.

By Gungun Mishra:

दक्षिण अफ्रीका की भारतीय तमिल मूल की 85 वर्षीय कानून विशेषज्ञ नवनितेम 'नवी' पिल्लै को शुक्रवार, 9 अक्टूबर को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया. नॉर्वे की नोबेल समिति ने उन्हें शांति और अंतरराष्ट्रीय कानून को बढ़ावा देने के लिए किए गए कामों को देखते हुए इस सम्मान के लिए चुना. पिल्लै ने लंबे समय तक मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन के मामलों में ताकतवर लोगों और देशों की जवाबदेही तय करने के लिए काम किया है.

नवी पिल्लै का करियर दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के दौर से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालतों और संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचा. उनके काम ने इस सोच को मजबूत किया कि स्थायी शांति तभी संभव है, जब पीड़ितों को न्याय मिले और अपराध करने वालों को उनके किए की सजा मिले.

रंगभेद के दौर में शुरू हुआ नवी पिल्लै का सफर

नवी पिल्लै का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में हुआ था. उनका बचपन ऐसे समय में बीता, जब दक्षिण अफ्रीका में रंग के आधार पर लोगों के साथ भेदभाव किया जाता था. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ नेटाल से पढ़ाई की और बाद में अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से कानून की उच्च डिग्रियां हासिल कीं.

1967 में वह नेटाल प्रांत में अपनी वकालत की प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली महिला बनीं. आगे चलकर वह दक्षिण अफ्रीका की हाई कोर्ट व्यवस्था में जज बनने वाली पहली अश्वेत महिला भी बनीं.

वकील के तौर पर उन्होंने रंगभेद का विरोध करने वाले लोगों के मुकदमे लड़े. उन्होंने राजनीतिक कैदियों, हिरासत में यातना दिए जाने और नागरिक अधिकारों पर पाबंदियों से जुड़े मामलों पर भी काम किया. इन अनुभवों ने उन्हें कानून के सामने सभी को बराबर अधिकार दिलाने और कमजोर वर्गों की रक्षा करने के लिए प्रेरित किया.

नेल्सन मंडेला ने बनाया दक्षिण अफ्रीका की हाई कोर्ट का जज

1995 में दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद खत्म होने और नेल्सन मंडेला के राष्ट्रपति बनने के बाद नवी पिल्लै को हाई कोर्ट में कार्यवाहक जज नियुक्त किया गया. वह इस पद पर पहुंचने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं.

उनकी नियुक्ति दक्षिण अफ्रीका की न्याय व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव थी. इससे पहले लंबे समय तक अश्वेत लोगों और महिलाओं को न्यायपालिका के बड़े पदों से दूर रखा गया था.

इसके बाद पिल्लै रवांडा के लिए बनाए गए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTR) में जज बनीं. 1999 में वह इसकी अध्यक्ष बनीं. बाद में उन्होंने 2003 से 2008 तक अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) में काम किया.

सितंबर 2008 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार उच्चायुक्त बनाया गया. वह 2014 तक इस पद पर रहीं.

बलात्कार को नरसंहार मानने वाले ऐतिहासिक फैसले में निभाई अहम भूमिका

नवी पिल्लै के करियर का सबसे महत्वपूर्ण काम 1998 में रवांडा से जुड़े एक ऐतिहासिक मामले में सामने आया. यह मामला रवांडा के पूर्व मेयर जीन-पॉल अकायेसू से जुड़ा था, जिन्हें नरसंहार और मानवता के खिलाफ अपराधों का दोषी ठहराया गया था.

पिल्लै उस जजों की बेंच का हिस्सा थीं, जिसने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. इस फैसले में पहली बार अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत यह माना गया कि बलात्कार और यौन हिंसा भी नरसंहार का हिस्सा हो सकते हैं, अगर इन अपराधों को किसी संरक्षित समुदाय को पूरी तरह या आंशिक रूप से खत्म करने के खास इरादे से अंजाम दिया गया हो.

इस फैसले में यह भी माना गया कि मामले में सामने आई परिस्थितियों के आधार पर बलात्कार को मानवता के खिलाफ अपराध माना जा सकता है.

इस फैसले ने अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून की दिशा बदल दी. इससे यह कानूनी मान्यता मजबूत हुई कि बड़े पैमाने पर होने वाले अत्याचारों के दौरान यौन हिंसा का इस्तेमाल किसी समुदाय को निशाना बनाने और उसे खत्म करने के हथियार के तौर पर किया जा सकता है.

इस फैसले से यौन हिंसा का सामना करने वाले पीड़ितों के अनुभवों को कानूनी पहचान मिली और युद्ध तथा संघर्ष के दौरान ऐसे अपराध करने वालों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता मजबूत हुआ.

Image Credit: AAJ TAK

भारत से गहरा रिश्ता, तमिल परिवार में हुआ जन्म

नवी पिल्लै का भारत से पुराना रिश्ता है. उनके तमिल पूर्वज 1890 के दशक में भारत से दक्षिण अफ्रीका गए थे. उन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर में मजदूरों के तौर पर नेटाल के गन्ने के बागानों में काम करने के लिए ले जाया गया था.

पिल्लै का बचपन भारतीय तमिल मूल के एक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार में बीता. उनका परिवार उन हजारों भारतीय परिवारों में शामिल था, जो औपनिवेशिक दौर में दक्षिण अफ्रीका में बस गए थे.

उनके पिता नरैनसामी नायडू बस ड्राइवर थे. परिवार का खर्च चलाने के लिए वह मछली पकड़ने समेत दूसरे काम भी करते थे. उनकी मां संथामा नायडू गृहिणी थीं. उन्होंने इस बात पर खास ध्यान दिया कि उनके सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले.

नवी पिल्लै के माता-पिता ने आठ बच्चों की परवरिश की. परिवार में हिंदू मूल्यों को काफी महत्व दिया जाता था. उनके माता-पिता लड़के और लड़कियों को बराबर मानते थे. यह उस दौर की बात है, जब सामाजिक और नस्ली भेदभाव के कारण भारतीय मूल के कई परिवारों के लिए आगे बढ़ने के मौके सीमित थे.

छह साल तक रहीं संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार प्रमुख

नवी पिल्लै ने 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के तौर पर काम किया. इस दौरान उन्होंने आम नागरिकों की सुरक्षा, महिलाओं के अधिकारों, बोलने की आजादी और समाज के कमजोर तथा हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए आवाज उठाई.

उन्होंने सीरिया समेत कई संघर्ष वाले इलाकों में मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर बार-बार चिंता जताई. साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपराध करने वालों की जवाबदेही तय करने की कोशिशों का समर्थन किया.

पिल्लै ने LGBT समुदाय के लोगों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा खत्म करने की भी मांग की.

2021 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया. यह आयोग पूर्वी यरुशलम समेत कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों और इजरायल से जुड़े मामलों की जांच के लिए बनाया गया था.

इसके बाद आयोग ने अंतरराष्ट्रीय कानून के कथित उल्लंघनों पर कई रिपोर्ट जारी कीं. 2025 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इजरायल ने गाजा में नरसंहार किया है. हालांकि, इजरायल ने इन निष्कर्षों को खारिज कर दिया.

पिल्लै अपने पूरे करियर में इस बात पर जोर देती रही हैं कि अंतरराष्ट्रीय कानून सिर्फ कमजोर देशों और लोगों पर ही नहीं, बल्कि ताकतवर देशों और प्रभावशाली व्यक्तियों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए.

संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरणों में उनके काम की संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों और मानवाधिकार संगठनों ने सराहना की.

2014 में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बान की मून ने कमजोर लोगों के अधिकारों की रक्षा और संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार व्यवस्था को मजबूत बनाने में उनके योगदान की प्रशंसा की थी.

डोनाल्ड ट्रंप, पोप लियो XIV समेत कई नाम थे चर्चा में

2026 के नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार दावा कर रहे थे कि वह इस पुरस्कार के हकदार हैं. उनका कहना था कि उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को रोकने में भूमिका निभाई है.

हालांकि, 8 अक्टूबर को प्रकाशित TIME की एक रिपोर्ट में ट्रंप के नोबेल शांति पुरस्कार जीतने की संभावना कम बताई गई थी.

इस पुरस्कार के लिए चर्चा में रहे दूसरे नामों में पोप लियो XIV भी शामिल थे. अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के दौरान शांति और बातचीत की उनकी अपीलों ने लोगों का ध्यान खींचा था.

इसके अलावा सूडान के इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स का नाम भी चर्चा में था. यह स्थानीय लोगों का एक मानवीय सहायता नेटवर्क है, जो सूडान में चल रहे गृहयुद्ध के दौरान लोगों को भोजन, स्वास्थ्य सेवाएं और दूसरी जरूरी मदद पहुंचा रहा है.

TIME ने यूक्रेन में बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले मायकोला कुलेबा और रूस की विपक्षी कार्यकर्ता यूलिया नवालनाया के नामों का भी जिक्र किया था.

हालांकि, नोबेल संस्थान अपने उम्मीदवारों की आधिकारिक शॉर्टलिस्ट सार्वजनिक नहीं करता. इसलिए ये सभी नाम सिर्फ सार्वजनिक चर्चा में थे, न कि पुरस्कार के आधिकारिक फाइनलिस्ट.

नवी पिल्लै का चयन शांति स्थापित करने के एक अलग नजरिए को सामने लाता है. यह नजरिया मजबूत कानूनी संस्थाओं, पीड़ितों को न्याय दिलाने और गंभीर अपराध करने वालों को सजा दिलाने पर जोर देता है.

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