आधी रात में बादलों के पीछे क्यों छिपा दिखा भारत, ISRO की सैटेलाइट तस्वीर ने मॉनसून पर क्या संकेत दिए?
22 जुलाई की आधी रात ISRO के सैटेलाइट ने भारत की ऐसी तस्वीर ली, जिसमें जमीन का बड़ा हिस्सा बादलों के पीछे छिपा नजर आया। इन बादलों के रंग, ऊंचाई और फैलाव में मॉनसून की मौजूदा चाल के कई संकेत छिपे हैं। जानिए यह तस्वीर बारिश को लेकर क्या बता रही है।

In Short
- INSAT-3DR और INSAT-3DS की तस्वीर में भारत का ज्यादातर हिस्सा बादलों की मोटी परत से ढका नजर आया।
- बिहार, पूर्वोत्तर और हिमालय की तलहटी के ऊपर 12 से 16 किलोमीटर ऊंचे क्युमुलोनिम्बस बादल दिखे।
- जून 2026 में बारिश सामान्य से करीब 40% कम रही, इसलिए सिर्फ इस बादल पट्टी से कमी पूरी होना तय नहीं है।
22 जुलाई की सुबह भारत के ऊपर मौसम का एक अलग नजारा देखने को मिला। ISRO के सैटेलाइट से ली गई तस्वीर में देश का ज्यादातर हिस्सा साफ नजर नहीं आया, क्योंकि कई इलाकों पर बादलों की मोटी परत छाई हुई थी।
यह तस्वीर सिर्फ बादलों का फैलाव ही नहीं दिखाती, बल्कि उनकी ऊंचाई, बारिश की ताकत और मॉनसून का हाल भी बताती है। अब सवाल है कि 36,000 किलोमीटर ऊपर से ली गई इस तस्वीर में आखिर क्या नजर आया?
36,000 किलोमीटर ऊपर से ली गई तस्वीर
22 जुलाई को सुबह करीब 2.15 बजे से 3.27 बजे के बीच INSAT-3DR और INSAT-3DS सैटेलाइट ने भारत की तस्वीरें लीं। ये सैटेलाइट धरती के बीच वाले हिस्से यानी इक्वेटर से करीब 36,000 किलोमीटर ऊपर मौजूद हैं।
इन तस्वीरों में भारत का ज्यादातर हिस्सा साफ नजर नहीं आया। उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के कई इलाकों पर बादलों की मोटी परत फैली हुई थी। हालांकि पश्चिमी राजस्थान और कच्छ के कुछ हिस्सों में आसमान साफ दिखा।
लेकिन आधी रात के समय भी सैटेलाइट को ये बादल इतने साफ कैसे दिखाई दिए?
रात में भी कैसे साफ दिखे बादल?
यह तस्वीर थर्मल इन्फ्रारेड टेक्नोलॉजी से ली गई थी। इसमें सैटेलाइट सूरज की रोशनी के बजाय गर्मी को रिकॉर्ड करता है। इसी वजह से रात में भी बादल और उनका टेम्परेचर साफ नजर आता है।
तस्वीर में बादलों की एक घुमावदार लाइन उत्तरी बंगाल की खाड़ी से ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश होते हुए गुजरात और अरब सागर तक फैली दिखाई दी।
लेकिन तस्वीर में दिख रहे लाल और गुलाबी रंग के धब्बे क्या बता रहे हैं?
लाल और गुलाबी धब्बों का क्या मतलब?
बिहार, नॉर्थ-ईस्ट और हिमालय के निचले इलाकों के ऊपर दिख रहे लाल और गुलाबी धब्बे बहुत ऊंचे और ठंडे बादलों की ओर इशारा करते हैं। इन बादलों के ऊपरी हिस्से का टेम्परेचर -60 डिग्री सेल्सियस से कम था, जबकि कुछ बादलों का टेम्परेचर -80 डिग्री सेल्सियस से भी नीचे पहुंच गया।
ऐसे बादल जमीन से करीब 12 से 16 किलोमीटर ऊपर तक पहुंच सकते हैं और ट्रोपोपॉज को छूते हैं। ट्रोपोपॉज हवा की वह सीमा है, जहां मौसम बनाने वाली परत खत्म हो जाती है।
अब सवाल है कि आखिर कौन-से बादल इतनी ज्यादा ऊंचाई तक पहुंच सकते हैं?
इतनी ऊंचाई तक कौन-से बादल पहुंचते हैं?
सिर्फ पूरी तरह तैयार क्युमुलोनिम्बस बादल ही इतनी ऊंचाई तक पहुंचते हैं। ये बादल तेज बारिश, बिजली और तूफान ला सकते हैं। इनका ऊपरी हिस्सा ऊपर जाकर चौड़ा और चपटा हो जाता है।
रेन गेज के आंकड़े भी तेज बारिश की बात सही साबित करते हैं। 20 जुलाई तक के 24 घंटों में मेघालय के विलियमनगर में 37 सेंटीमीटर और उत्तराखंड के शामा में 22 सेंटीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई।
लेकिन इतनी तेज बारिश कराने वाला मॉनसून ट्रफ अभी किस इलाके में है?
अभी कहां है मॉनसून ट्रफ?
IMD के मुताबिक मॉनसून ट्रफ अभी अपनी सामान्य जगह के आसपास बना हुआ है। यह उत्तर भारत में बनी लो-प्रेशर की एक लंबी पट्टी होती है, जो तय करती है कि किन इलाकों में ज्यादा बारिश होगी।
इसके अलावा पंजाब, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, झारखंड-बिहार, दक्षिण-पश्चिम राजस्थान और असम के ऊपर साइक्लोनिक सर्कुलेशन बने हुए हैं। इसका मतलब है कि इन इलाकों के ऊपर हवा गोल-गोल घूम रही है।
हवा की बीच वाली परत में एक ट्रफ पश्चिम-मध्य बंगाल की खाड़ी से उत्तर-पूर्व अरब सागर तक फैला हुआ है। सैटेलाइट तस्वीर में दिख रही बादलों की तिरछी पट्टी इसी वेदर सिस्टम का हिस्सा है।
अब सवाल है कि क्या ये सभी वेदर सिस्टम मिलकर बारिश की कमी पूरी कर पाएंगे?
क्या बारिश की कमी पूरी हो पाएगी?
सिर्फ बादलों की इतनी बड़ी पट्टी से बारिश की पूरी कमी दूर नहीं होगी। जून 2026 में भारत में 99.5 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जो सामान्य से करीब 40% कम रही। यह 1901 के बाद पांचवां सबसे सूखा जून था।
IMD के मंथली अनुमान के मुताबिक, जुलाई में बारिश लंबे समय के औसत 280.4 मिलीमीटर के 94% से भी कम रह सकती है। उत्तर-पश्चिम और उत्तर-पूर्व भारत में अगले चार से पांच दिनों तक मॉनसून एक्टिव रहने की उम्मीद है। वहीं वेस्ट-सेंट्रल और साउथ पेनिनसुलर इंडिया में मॉनसून कमजोर रह सकता है।
देश के ज्यादातर हिस्सों पर बादल छाना मॉनसून के लिए अच्छा संकेत है, लेकिन पिछली बारिश की कमी पूरी करने के लिए इन वेदर सिस्टम्स का लगातार एक्टिव रहना जरूरी है।