विदेश में क्यों रुक जाते हैं कई भारतीय? कनाडा में रह रहे IT प्रोफेशनल ने बताई ये वजह

कनाडा में रहने वाले एक भारतीय आईटी प्रोफेशनल का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। उनका कहना है कि विदेश में रुकने की वजह सिर्फ अच्छी सैलरी या बेहतर सुविधाएं नहीं, बल्कि ऐसा वर्क कल्चर है जहां नौकरी के साथ निजी समय को भी अहम माना जाता है।

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In Short

  • विदेश में रहने की बड़ी वजह बना वर्क-लाइफ बैलेंस।
  • शाम 5 बजे के बाद काम खत्म होने का दावा।
  • छुट्टी लेने और निजी समय पर खुलकर हुई चर्चा।

By Gaurav Kumar:

Office Culture: विदेश में रहने वाले भारतीयों से अक्सर पूछा जाता है कि मौका मिले तो क्या वे भारत वापस आना चाहेंगे। इसका जवाब हर किसी के लिए अलग होता है। कोई अच्छी नौकरी को जरूरी मानता है, कोई बच्चों की पढ़ाई को और कोई बेहतर जीवन को। इसी बीच कनाडा के हैलिफैक्स में रहने वाले भारतीय आईटी प्रोफेशनल रोहित गुप्ता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।

रोहित का कहना है कि विदेश में रहने की वजह सिर्फ अच्छी सैलरी, साफ हवा या बेहतर सड़कें नहीं हैं। उनके मुताबिक, सबसे बड़ा फर्क वहां के वर्क कल्चर में है, जहां कर्मचारी के निजी समय की भी कद्र की जाती है।

सिर्फ अच्छी सुविधाएं ही वजह नहीं

वीडियो में रोहित कहते हैं कि जो लोग अपनी जिंदगी के 20 से 25 साल भारत में बिता चुके हैं, वे केवल साफ हवा या पानी की वजह से विदेश में नहीं रुकते।

उनके मुताबिक, ऑफिस का माहौल ज्यादा मायने रखता है। वहां काम के साथ परिवार, आराम और निजी समय को भी जरूरी समझा जाता है। यही बात कई लोगों के विदेश में रहने के फैसले को प्रभावित करती है।

शाम 5 बजे के बाद काम खत्म

रोहित बताते हैं कि अगर ऑफिस का समय शाम 5 बजे तक है, तो उसके बाद सिर्फ बॉस को खुश करने के लिए बैठे रहने की उम्मीद नहीं की जाती।

कई बार मैनेजर खुद अपनी टीम से पहले ऑफिस से निकल जाते हैं। वहां देर तक रुकने को हमेशा मेहनत की निशानी नहीं माना जाता। ज्यादा जरूरी यह होता है कि काम समय पर पूरा हो जाए।

छुट्टी लेने में कम झंझट

रोहित का कहना है कि भारत में कई कर्मचारियों को छुट्टी लेने से पहले बहुत कुछ सोचने की जरूरत पड़ती है। उन्हें अपने काम का इंतजाम, नॉलेज ट्रांसफर और रिप्लेसमेंट जैसी बातों की चिंता रहती है।

कनाडा में उनके अनुभव के मुताबिक, कर्मचारी थकान, परिवार से मिलने या घूमने के लिए छुट्टी लेने की बात खुलकर कर सकते हैं। हालांकि, छुट्टी के नियम हर कंपनी में अलग हो सकते हैं।

वर्क-लाइफ बैलेंस का मतलब क्या है?

वर्क-लाइफ बैलेंस का मतलब कम काम करना नहीं है। इसका मतलब है कि नौकरी के साथ परिवार, आराम, सेहत और अपनी पसंद के कामों के लिए भी समय मिले।

इससे कर्मचारी कम तनाव महसूस कर सकते हैं और लंबे समय तक बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं।

भारत में भी हो रहा बदलाव

भारत की कई कंपनियां अब फ्लेक्सिबल वर्किंग, हाइब्रिड मॉडल, मानसिक स्वास्थ्य और कर्मचारियों की सुविधा पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। हालांकि, हर कंपनी और टीम का माहौल एक जैसा नहीं होता।

वीडियो पर लोगों की मिली-जुली राय सामने आई है। कई लोगों ने कहा कि वे भी अपने ऑफिस में ऐसा माहौल चाहते हैं। वहीं कुछ लोगों ने लिखा कि भारत और कनाडा दोनों जगह सभी कंपनियों का अनुभव एक जैसा नहीं होता। महामारी के बाद वर्क-लाइफ बैलेंस और बर्नआउट पर बढ़ी चर्चा की वजह से यह वीडियो लोगों का ध्यान खींच रहा है।
 

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