बाढ़ आने से 2 घंटे पहले मिल जाएगा अलर्ट! भारत में पहली बार लगी ये स्वदेशी तकनीक

उत्तराखंड के चमोली में वैज्ञानिकों ने बड़ी कामयाबी हासिल की है। देश में पहली बार ग्लेशियल झील पर पूरी तरह स्वदेशी अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया गया है। यह सिस्टम अचानक आने वाली बाढ़ का अलर्ट करीब दो घंटे पहले दे सकेगा। जानें इस सिस्टम की खासियत और यह कैसे काम करेगा।

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In Short

  • भारत में पहली बार चमोली की वसुंधरा झील पर पूरी तरह स्वदेशी GLOF अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया गया है।
  • ग्लेशियल झील से अचानक बाढ़ आने की चेतावनी करीब 2 घंटे पहले मिलने की उम्मीद है।
  • करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाला सिस्टम वैज्ञानिकों ने महज 61 लाख रुपये में तैयार किया है।

By Sonam:

उत्तराखंड के चमोली में वैज्ञानिकों ने बड़ी कामयाबी हासिल की है. देश में पहली बार किसी ग्लेशियल झील पर पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से तैयार ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया गया है. केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की के वैज्ञानिकों ने वसुंधरा झील पर इसे स्थापित किया है. इस सिस्टम की मदद से अचानक आने वाली बाढ़ की चेतावनी करीब दो घंटे पहले मिलने की उम्मीद है. इससे निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाने में मदद मिलेगी.

8 करोड़ का सिस्टम सिर्फ 61 लाख में तैयार

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत इसकी लागत है. वैज्ञानिकों ने जिस सिस्टम की अनुमानित कीमत करीब 8 करोड़ रुपये बताई गई थी, उसे महज 61 लाख रुपये में तैयार कर स्थापित कर दिया. यह तकनीक भविष्य में देश की दूसरी खतरनाक ग्लेशियल झीलों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है.

CBRI से जुड़े आर प्रदीप कुमार के मुताबिक, देश में 13 ग्लेशियल झीलों को खतरनाक घोषित किया जा चुका है. इन झीलों से अचानक पानी निकलने पर निचले इलाकों में भारी तबाही मच सकती है.

कैसे काम करेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम?

इस सिस्टम में कुल आठ सेंसर लगाए गए हैं, जो झील के जलस्तर और आसपास की प्राकृतिक गतिविधियों पर नजर रखेंगे. इनमें सबमर्सिबल वाटर लेवल सेंसर और फ्लोटिंग वाटर सेंसर शामिल हैं.

Image Credit : Aaj Tak

इसके अलावा झील के कैचमेंट क्षेत्र में चार एक्सेलेरोमीटर लगाए गए हैं. ये भूस्खलन, हिमस्खलन और जमीन में होने वाली असामान्य हलचल को रिकॉर्ड करेंगे. इनसे मिलने वाले डेटा के आधार पर संभावित खतरे की पहचान की जा सकेगी.

बर्फबारी और तेज हवाओं के बीच पूरा किया मिशन

CBRI के वैज्ञानिक डॉ. डीपी कानूनगो के मुताबिक, इस अभियान में नौ सदस्य शामिल थे. टीम ने बेहद कठिन मौसम और ऊंचाई वाले इलाके में काम किया.

आईटीबीपी ने वैज्ञानिकों को छह दिन तक ऊंचाई वाले वातावरण के अनुकूल होने की सलाह दी थी, लेकिन समय की कमी के चलते टीम ने तीन दिन में यह प्रक्रिया पूरी की. इसके बाद वैज्ञानिकों ने करीब सात से आठ किलोमीटर की ट्रेकिंग की.

ढाई दिन में खड़ा किया पूरा सिस्टम

वैज्ञानिकों ने महज ढाई दिन में पांच से छह मीटर ऊंचा टावर, मजबूत फाउंडेशन, सोलर पैनल और सेंसर लगाने का काम पूरा कर लिया. बर्फबारी के कारण सोलर पैनल को खड़ी स्थिति में लगाना पड़ा.

अब सिस्टम से डेटा मिलना शुरू हो गया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक हिमालयी राज्यों में बाढ़ से होने वाले जानमाल के नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है.

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