कैलाश मानसरोवर यात्रा की 52 KM परिक्रमा ही नहीं, ये वजह बनाती है सफर बेहद मुश्किल
कैलाश मानसरोवर यात्रा सिर्फ आस्था का सफर नहीं, बल्कि शरीर और हौसले की कठिन परीक्षा भी है। हजारों मीटर की ऊंचाई, कम ऑक्सीजन, कड़ाके की ठंड और बदलता मौसम इसे बेहद चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। जानिए इस यात्रा में कौन-सा पड़ाव श्रद्धालुओं के लिए सबसे मुश्किल साबित होता है।

In Short
- कैलाश मानसरोवर यात्रा में सबसे बड़ी चुनौती ऊंचाई और कम ऑक्सीजन है, क्योंकि रास्ता 5,000 मीटर से भी ऊपर पहुंचता है।
- करीब 52-53 किलोमीटर की कैलाश परिक्रमा में खड़ी चढ़ाई, पथरीले रास्ते और जमा देने वाली ठंड यात्रियों की परीक्षा लेते हैं।
- हिमालय में अचानक बदलता मौसम, भारी बारिश और बर्फबारी रास्तों को बंद कर सकती है और पूरी यात्रा प्रभावित हो सकती है।
कैलाश मानसरोवर यात्रा को दुनिया की सबसे कठिन धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है। इसकी वजह सिर्फ लंबा रास्ता नहीं, बल्कि बेहद ऊंचाई, कम ऑक्सीजन, कड़ाके की ठंड और मुश्किल हिमालयी रास्ते भी हैं। हाल में नेपाल में आई बाढ़ ने यह भी दिखाया कि इस क्षेत्र में अचानक बदलने वाला मौसम पूरी यात्रा को प्रभावित कर सकता है।
सबसे बड़ी चुनौती है ऊंचाई
यात्रा के कई हिस्से 4,000 मीटर से ज्यादा ऊंचाई पर हैं, जबकि लिपुलेख दर्रा करीब 5,050 मीटर तक पहुंचता है। इतनी ऊंचाई पर शरीर को कम ऑक्सीजन मिलती है। इससे सिरदर्द, मतली, चक्कर और सांस लेने में दिक्कत जैसी समस्याएं हो सकती हैं।इसी वजह से यात्रियों के लिए धीरे-धीरे ऊंचाई के अनुसार शरीर को ढालना बेहद जरूरी होता है। इसे सामान्य ट्रेक की तरह नहीं लिया जा सकता।
कैलाश परिक्रमा में असली परीक्षा
माउंट कैलाश की परिक्रमा करीब 52-53 किलोमीटर लंबी है। रास्ते में खड़ी चढ़ाई, चट्टानी जमीन और बेहद ठंडे इलाके आते हैं। सबसे कठिन हिस्सों में डोल्मा ला पास शामिल है, जिसकी ऊंचाई 5,600 मीटर से ज्यादा है।कम ऑक्सीजन के बीच इतनी ऊंचाई पर पैदल चलना शरीर पर काफी दबाव डालता है।
मौसम कभी भी बिगाड़ सकता है सफर
हिमालयी क्षेत्र में मौसम तेजी से बदल सकता है। बर्फबारी, बारिश, तेज हवा और अचानक गिरता तापमान रास्तों को मुश्किल बना सकता है। नेपाल की बाढ़ ने यह भी दिखाया कि भारी बारिश से सड़कें और पुल प्रभावित हो सकते हैं, जिससे यात्री फंस सकते हैं।
21-22 दिन तक चलती है यात्रा
भारत सरकार की आधिकारिक कैलाश मानसरोवर यात्रा रूट के अनुसार करीब 21-22 दिन तक चल सकती है। इस दौरान यात्री अलग-अलग पड़ावों से गुजरते हुए धीरे-धीरे ज्यादा ऊंचाई तक पहुंचते हैं।इसके बावजूद हर साल श्रद्धालु इस कठिन सफर को चुनते हैं। हिंदू धर्म के साथ-साथ बौद्ध, जैन और बॉन परंपरा में भी माउंट कैलाश को पवित्र माना जाता है। यही आस्था इस मुश्किल यात्रा को खास बनाती है।