कच्चा तेल 119 डॉलर के पार! क्रूड ऑयल में 29% उछाल से हिला ग्लोबल बाजार - एशिया के मार्केट टूटे
ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स करीब 29 फीसदी चढ़कर लगभग 119 डॉलर प्रति बैरल के पास पहुंच गया। इसके असर से एशिया के इक्विटी बाजारों में भारी गिरावट देखने को मिली। कोरिया से लेकर जापान तक शेयर बाजारों में 7 फीसदी तक की गिरावट दर्ज हुई।

Crude oil price today: सोमवार को ग्लोबल बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने निवेशकों को झटका दिया। ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स करीब 29 फीसदी चढ़कर लगभग 119 डॉलर प्रति बैरल के पास पहुंच गया। इसके असर से एशिया के इक्विटी बाजारों में भारी गिरावट देखने को मिली। कोरिया से लेकर जापान तक शेयर बाजारों में 7 फीसदी तक की गिरावट दर्ज हुई।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ी चिंता
सुबह 8.34 बजे तक मई डिलीवरी वाले ब्रेंट फ्यूचर्स 26.6 फीसदी या 24.81 डॉलर उछलकर 117.58 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए थे। कारोबार के दौरान यह 119.46 डॉलर तक चढ़ गया, जो करीब 28.8 फीसदी की तेजी दिखाता है।
तेल की कीमतों में यह उछाल ऐसे समय आया है जब कुवैत और इराक ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते शिपिंग बाधित रहने की आशंका के बीच तेल उत्पादन घटाना शुरू कर दिया है। यह जलमार्ग ग्लोबल तेल और गैस आपूर्ति का करीब पांचवां हिस्सा ढोता है, इसलिए किसी भी बाधा से बाजार तुरंत प्रतिक्रिया देता है।
इसी बीच कतर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने चेतावनी दी है कि अगर टैंकरों की आवाजाही जल्दी सामान्य नहीं हुई तो अगले दो से तीन हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
भारतीय बाजारों पर बढ़ा दबाव
एसएएमसीओ सिक्योरिटीज में हेड ऑफ मार्केट पर्सपेक्टिव्स एंड रिसर्च अपूर्वा शेठ के मुताबिक, ऐतिहासिक रूप से कच्चे तेल और निफ्टी 50 के बीच उलटा संबंध देखा गया है। भारत बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है, इसलिए तेल की कीमत बढ़ने पर आयात बिल और महंगाई का दबाव बढ़ता है, जो बाजार की धारणा को कमजोर करता है।
शेठ का कहना है कि कमोडिटी साइकिल में बदलाव, गोल्ड-क्रूड अनुपात का ऊंचा स्तर और बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिम यह संकेत दे रहे हैं कि कच्चा तेल व्यापक कमोडिटी चक्र के मजबूत चरण में प्रवेश कर सकता है।
वहीं एनरिच मनी के सीईओ पोनमुडी आर ने अपने साप्ताहिक नोट में कहा कि ऊर्जा कीमतों में तेज बढ़ोतरी से भारत की मैक्रोइकॉनॉमिक चिंताएं बढ़ गई हैं। इससे रिफाइनर, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों और ट्रांसपोर्ट, पावर व सीमेंट जैसे ऊर्जा-निर्भर सेक्टरों की लागत बढ़ेगी। साथ ही चालू खाते का घाटा बढ़ने, आयातित महंगाई और रुपये पर दबाव का खतरा भी बढ़ सकता है।