मोदी सरकार का ‘वॉटर डिप्लोमेसी’ मिशन! एक महीने में सुलझे दशकों पुराने जल विवाद, अब कई और बड़े समझौते की तैयारी
मोदी सरकार विकसित भारत-2047 के लक्ष्य के तहत राज्यों के बीच दशकों पुराने जल विवाद सुलझाने में जुटी है। हरियाणा-राजस्थान और नर्मदा विवाद के बाद अब किशाऊ परियोजना, बिहार-झारखंड, कृष्णा और कावेरी जैसे बड़े मामलों पर भी तेजी से सहमति बनाने की कोशिश की जा रही है।

In Short
- मोदी सरकार ने विकसित भारत-2047 के लक्ष्य के तहत राज्यों के बीच दशकों पुराने जल विवादों को सुलझाने का अभियान तेज कर दिया है।
- हरियाणा-राजस्थान और चार राज्यों के नर्मदा विवाद के समाधान के बाद अब 15 जुलाई को छह राज्यों के बीच किशाऊ परियोजना पर बड़े समझौते की तैयारी है।
- केंद्र सरकार अब बिहार-झारखंड के सोन नदी विवाद और दक्षिण भारत के कृष्णा व कावेरी जल विवादों के समाधान पर भी तेजी से काम कर रही है।
विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में मोदी सरकार ने अब राज्यों के बीच दशकों से चले आ रहे जल विवादों को खत्म करने का बड़ा अभियान शुरू किया है। पिछले एक महीने में ही केंद्र सरकार ने ऐसे कई ऐतिहासिक समझौते कराए हैं, जिन्हें लंबे समय से राजनीतिक मतभेद, कानूनी लड़ाइयों और वित्तीय विवादों की वजह से अटका माना जाता था। सूत्रों के मुताबिक यह सिर्फ शुरुआत है। आने वाले दिनों में बिहार-झारखंड, दक्षिण भारत और दूसरे राज्यों से जुड़े कई बड़े जल विवादों को भी सुलझाने की तैयारी चल रही है।
सरकार के शीर्ष सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत-2047 के विजन के तहत राज्यों के बीच लंबित विवादों को खत्म करने पर विशेष जोर दिया है। प्रधानमंत्री लगातार 'सहकारी संघवाद' और 'टीम इंडिया' की भावना के साथ राज्यों को साझेदार बनाकर आगे बढ़ने की बात करते रहे हैं। इसी रणनीति के तहत गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल को राज्यों के बीच वर्षों से लंबित जल विवादों के समाधान की जिम्मेदारी दी गई।
सूत्रों का कहना है कि शुरुआत उन विवादों से की गई जहां सहमति बनने की संभावना अधिक थी। गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ कई दौर की बैठकें कीं। नतीजा यह रहा कि केवल एक महीने के भीतर तीन बड़े समझौते हो गए और कई अन्य अंतिम चरण में पहुंच गए हैं।
30 साल पुराना हरियाणा-राजस्थान विवाद खत्म
29 जून को केंद्र सरकार ने पहली बड़ी सफलता हासिल की। गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में हरियाणा और राजस्थान ने यमुना जल परियोजना पर ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए।
करीब तीन दशक से अटकी इस परियोजना पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के बीच सहमति बनी। इसके बाद दोनों राज्यों ने परियोजना के निर्माण और क्रियान्वयन का रास्ता साफ कर दिया। इस समझौते से राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र और हरियाणा के सीमावर्ती इलाकों में यमुना के अतिरिक्त पानी का बेहतर उपयोग संभव होगा।
चार राज्यों के बीच नर्मदा विवाद का भी समाधान इसके ठीक एक सप्ताह बाद 7 जुलाई को केंद्र सरकार ने दूसरी बड़ी कामयाबी हासिल की।
मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के बीच नर्मदा नदी पर बनी सरदार सरोवर और इंदिरा सागर परियोजनाओं से जुड़े दशकों पुराने वित्तीय विवाद को खत्म कर दिया गया।
विस्थापितों के पुनर्वास, डूब क्षेत्र के मुआवजे और निर्माण लागत पर ब्याज को लेकर वर्षों से चारों राज्यों के बीच विवाद था। गृह मंत्री अमित शाह और जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की मौजूदगी में चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने ‘वन टाइम सेटलमेंट’ समझौते पर हस्ताक्षर कर इस विवाद को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।
अब 15 जुलाई को छह राज्यों का बड़ा समझौता
सूत्रों के मुताबिक अब अगला बड़ा समझौता 15 जुलाई को होने की संभावना है। यह समझौता हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के बीच किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर होगा।
यमुना की सहायक टोंस नदी पर बनने वाला किशाऊ बांध वर्षों से विभिन्न राज्यों के बीच सहमति का इंतजार कर रहा था। सूत्रों का कहना है कि गृह मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप और जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की लगातार बैठकों के बाद अब सभी छह राज्यों के बीच सहमति बन चुकी है।
यदि सब कुछ तय कार्यक्रम के मुताबिक रहा तो 15 जुलाई को सभी छह राज्यों के मुख्यमंत्री एक मंच पर इस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे।
इस परियोजना से दिल्ली सहित छह राज्यों को पेयजल, सिंचाई और बिजली उत्पादन में बड़ा लाभ मिलेगा। साथ ही यमुना नदी के पुनर्जीवन की दिशा में भी इसे अहम कदम माना जा रहा है।
अब बिहार-झारखंड की बारी
सरकारी सूत्रों के मुताबिक अगला बड़ा घटनाक्रम बिहार और झारखंड के बीच दशकों पुराने सोन नदी विवाद को लेकर हो सकता है।
1973 के बाणसागर समझौते के बाद झारखंड के गठन से यह विवाद लगातार बना हुआ था। झारखंड लंबे समय से दो मिलियन एकड़ फीट पानी की मांग कर रहा था।
सूत्रों का दावा है कि अब इस विवाद पर सहमति बन चुकी है। प्रस्तावित फॉर्मूले के तहत कुल 7.75 एमएएफ पानी में से बिहार को 5.75 एमएएफ और झारखंड को 2 एमएएफ पानी मिलेगा। इसके बाद इंद्रपुरी जलाशय परियोजना का रास्ता भी साफ हो जाएगा।
दक्षिण भारत के सबसे मुश्किल विवादों पर भी नजर
केंद्र सरकार अब दक्षिण भारत के जटिल जल विवादों पर भी सक्रिय हो गई है। सूत्रों के मुताबिक कृष्णा नदी के जल बंटवारे को लेकर कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के बीच समाधान की दिशा में सकारात्मक प्रगति हुई है।
2014 में तेलंगाना बनने के बाद यह विवाद लगातार बढ़ा था। लेकिन हाल ही में कांग्रेस शासित कर्नाटक और तेलंगाना सरकारों ने मतभेदों को पीछे छोड़ते हुए नारायणपुर बांध के डाउनस्ट्रीम में संयुक्त बैराज बनाने का फैसला किया है। इसे केंद्र सरकार की मध्यस्थता का सकारात्मक परिणाम माना जा रहा है।
मंत्रालय के सूत्रो के अनुसार केंद्र सरकार की नजर अब देश के सबसे पुराने और सबसे संवेदनशील कावेरी जल विवाद पर है। तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच दशकों से चले आ रहे इस विवाद को सुलझाने के लिए भी आने वाले समय में पहल की जाएगी। हालांकि दोनों राज्यों के राजनीतिक रुख और मेकेदातु परियोजना को लेकर जारी मतभेदों के कारण यह सबसे चुनौतीपूर्ण मामला माना जा रहा है।
सरकार का मानना है कि इन समझौतों का सबसे बड़ा लाभ किसानों और आम लोगों को मिलेगा। वर्षों से अदालतों, फाइलों और वित्तीय विवादों में फंसा पानी अब सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल हो सकेगा।
मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि दशकों पुराने इन विवादों का समाधान केवल कानूनी प्रक्रिया से संभव नहीं था। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, राज्यों के बीच भरोसा और सहकारी संघवाद की भावना जरूरी थी। केंद्र सरकार अब इसी मॉडल पर एक-एक करके दूसरे पुराने अंतरराज्यीय जल विवादों को भी खत्म करने की रणनीति पर काम कर रही